
Chetan Gurung
देहरादून के DM और साल-2009 Batch के IAS सविन बंसल फिर सुर्खियों में हैं। इस बार Clement Town Cantt Board की Chief Executive Officer अंकिता सिंह के आधिकारिक वाहन को जबरन खींच लाने के लिए प्रशासन का दस्ता उनके दफ्तर भेजे जाने को ले के। इस पर अंकिता ने अपनी IDES Batch और महिला होने तथा कोई आपात स्थिति न होने का हवाला देते हुए CM पुष्कर सिंह धामी को खत तक लिख डाला है। सविन की प्रतिष्ठा अलग किस्म की है। वह सिद्धांतों और नियमों को ले के मंत्रियों और साथ के या फिर अपने से वरिष्ठ अफसरों तक से भिड़ जाने से गुरेज नहीं करते हैं। उनको रूखा-कम बोलने वाला और काम से मतलब रखने वाले लेकिन आम लोगों को फौरन इंसाफ दिलाने वाला माना जाता है। आज की तारीख में वह वाकई लोगों में बेहद लोकप्रिय हैं। मुख्यमंत्री ने भी उनको Super Time Scale (शासन में सचिव या फिर Divisional Commissioner के समकक्ष) होने के बावजूद राजधानी का जिलाधिकारी 13 महीने से ज्यादा समय से बनाया हुआ है। DM बने उनको 17 महीने से अधिक हो चुके हैं। वह Robin Hood सरीखी छवि बनाए हुए हैं। मंत्री रेखा आर्य के बाद उनका गणेश जोशी और अपने से Senior IAS हरी सेमवाल (अब Retired) से भी विवाद हो चुका है।

Savin Bansal
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CEO अंकिता का वाहन खींच लाने के मामले में DM सविन के पक्ष को भी समझना होगा। भारत सरकार की ही जनगणना से मुताल्लिक बैठक में अंकिता नहीं आईं थीं। सविन ने बैठक बुलाई थी। भारत में प्रशासनिक व्यवस्था ऐसी है कि DM (या Collector भी कहते हैं) जिले का प्रशासनिक मुखिया होता है। अगर कहीं Police Commissioner व्यवस्था लागू है तब स्थिति इतर हो सकती है। SSP का IPS Batch भले DM के IAS Batch से वरिष्ठ हो, बैठक में Warrant of Precedence के मुताबिक DM को SSP (या SP) से ऊपर रखा जाता है। उसी तरह, जैसे DGP का Batch कितना भी पुराना हो, वह Chief Secretary से नीचे ही होगा। पुराने और खुर्राण्ट IAS अफसरों की दलील है कि DGP एक महकमे का HoD होता है। उसी तरह जैसे Forest या Health महकमे का। प्रमुख सचिव भी WoP में उनसे आगे रहता है। ये बात दीगर है कि महकमा अहम होने के नाते DGP को सरकार में तवज्जो दी जाती है।
IPS अफसर अपनी तुलना सेना के Chiefs (Army-Airforce-Navvy) से नहीं कर सकते हैं। तीनों को Cabinet Secretary के समकक्ष दर्जा मिला हुआ है। बाकी अपनी पकड़ और दबंगई का खेल है। मैंने CS को CM के OSDs के आगे हुक्का भरते देखा है। खास तौर पर ND तिवारी के दौर में। एक कप्तान के आदेश को देहरादून में एक कोतवाल ने धता बता दिया था। दबंग और शानदार छवि होने के बावजूद कप्तान कुछ बिगाड़ नहीं पाए थे। खुद को ही Back Out करना पड़ा था। कई कोतवाल और Inspectors सरकार में कप्तानों को छोड़िए उनसे भी वरिष्ठ से ज्यादा दमखम रखते हैं। कप्तानों की हिम्मत उनको छेड़ने की नहीं रहती है। ऐसा सभी सरकारों में रहा है। कई कप्तान इतनी मजबूत पकड़ रखते हैं कि DGP और गृह सचिव भी उनका बाल बांका नहीं कर पाते हैं। कप्तान से कोई काम पड़ जाए तो DGP को सीधे Additional SP या फिर उससे नीचे कोतवाल-SO या फिर चौकी In-Charge से सीधे फोन पर बात करते देखा है।

Chetan Gurung
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DGP को गृह सचिव या CS को बाइपास कर सीधे मुख्यमंत्री से मिलते देखना आम बात है। Intelligence Chief को DGP-HS-CS को बाईपास कर सीधे CM से मिलते देखना अलबत्ता, Duty का हिस्सा माना जा सकता है। ये बात अलग है कि इसके चलते कई बड़े नौकरशाह और पुलिस के HoD अपने खुफिया प्रमुख से खौफ खाते हैं या फिर बेहद सतर्क रहने की कोशिश करते हैं। न जाने सरकार के कान में क्या उल्टा-सीधा-सच-झूठ फूँक दें। जहां तक सवाल चलने और चलाने की है, ये व्यक्ति या नौकरशाह विशेष पर निर्भर करता है। Indian Forest Service वाले अशोक पई प्रमुख सचिव बन गए थे। डॉ RBS रावत ACS बनते-बनते रह गए थे। रावत बाद में भर्ती घोटाले में जेल गए। तब तक वह Retire हो गए थे। चयन आयोग के अध्यक्ष हो गए थे। IFS (विदेश सेवा वाले) विनोद फोनिया और IDAS अजय प्रद्योत सचिव बन गए थे। अभी ITS (Telecom वाले) दीपक गैरोला भी सचिव हैं। इनमें कोई भी All India Civil Service Cadre वाले नहीं थे या हैं।
All India Cadre वाले IPS कभी सचिव नहीं बन पाए। बने तो Special Principal Secretary या फिर Special Secretary और Additional Secretary। अभी 1997 Batch के IPS अमित सिन्हा Sports महकमे के विशेष प्रमुख सचिव हैं। उनसे पहले 1996 Batch के IPS अभिनव कुमार इसी ओहदे पर थे। मौजूदा DGP दीपम सेठ भी अपर सचिव (तब CM रमेश पोखरियाल निशंक थे) रह चुके हैं। गैर IAS Cadre वालों की Posting में कभी भी Batch या Cadre को तवज्जो नहीं दी गई। CRPF के धर्मेंद्र सिंह दताल भी हरीश रावत की सरकार में Deputation पर अपर सचिव और Director थे। BC खंडूड़ी सरकार में एक Para Military Force का Inspector यहाँ Deputation पर SP का ओहदा ले के बैठा।
आज दीपक गैरोला अगर Batch को देखे तो ACS के समकक्ष हैं लेकिन सचिव हैं। वह भी मरियल महकमे के। लब्बो-लुआब ये कि बात सिर्फ सरकार में चलने और चलाने की है। Batch और Cadre खामोख्वाह का मुद्दा है। अंकिता सिंह अगर ये दलील देती हैं कि वह Batch में किसी फलां IAS के Batch से ऊपर है तो ये सिवाय खुद को धोखे में रखने से ज्यादा कुछ नहीं। All India Service वाले अलबत्ता, फिर भी एक-दूसरे के Batch की Seniority को सम्मान जरूर देते हैं। नितेश झा जब गृह सचिव थे तो कभी DGP अशोक कुमार को अपने दफ्तर नहीं बुलाया। नितेश और उनकी पत्नी राधिका (साल-2002 Batch) का त्रिवेन्द्र सरकार में डंका बजता था। अलबत्ता,विजेंद्र पाल और राकेश शर्मा को गृह सचिव रहते मैंने पुलिस महकमे की बैठक लेते और उनकी बैठक में Batch के लिहाज से काफी वरिष्ठ IPS अफसरों और DGP तक को देखा है। वे दरअसल उन IAS अफसरों में शुमार किए जाते हैं, जिन्होंने अपने Cadre को ताकत दी।
जहां तक नौकरशाहों में झगड़े या तनातनी का सवाल है, ये कोई आज के दौर में डायनासोर दिख जाने सरीखा हैरान नहीं करता है। उत्तराखंड बनने से पहले ही वरिष्ठ IAS SN शुक्ल को उनकी इच्छा होने के बावजूद नौकरशाहों की एक मजबूत लॉबी ने नए राज्य में नहीं आने दिया। डॉ रघुनंदन सिंह टोलिया और सुरजीत किशोर दास-आलोक कुमार जैन की M रामचंद्रन से हमेशा ठनी रही। संयोगवश ये सभी Chief Secretary बने। रामचंद्रन 1972 Batch के थे। System में उनका खौफ था। CM NDT के बेहद खास थे। डॉ टोलिया उनसे एक Batch (1971) वरिष्ठ और दास एक Batch कनिष्ठ (1973) थे। जैन जरूर काफी कनिष्ठ (1979 Batch) थे। एक ही Batch (1977) वाले अजय जोशी और सुभाष कुमार में दुश्मनी ही थी। दोनों CS बनने के लिए आतुर थे। बाजी सुभाष के हाथ लगी। बल्कि दो बार लगी। जोशी खामोशी के साथ सेवा से विदा हो गए।
जोशी और 1980 Batch वाले पूरंचन्द्र शर्मा में सचिवालय में भरी बैठक में जोशी के ही दफ्तर में जबर्दस्त तू-तड़ाक के मुझ सहित कई बड़े नौकरशाह गवाह थे। CM तब निशंक थे। IPS Cadre में कंचन चौधरी भट्टाचार्य (1973 Batch) और सुभाष जोशी (1976 Batch) में भी रिश्ते अच्छे नहीं थे। Indian Defence Estates Service की अंकिता की DM से सीधे दो-दो हाथ करना प्रशासनिक नजरिए से उनको ही गलत साबित करेगा। DM एक System का नाम है। उसका Batch से वास्ता नहीं होता। नैनीताल के DM बनाए जाते समय हरिताश गुलशन (एक हादसे में DM रहते ही मौत हो गई थी) की नौकरी को 5 साल ही हुए थे। कुछ IPS अफसर 1 या 2-3 साल से भी कम की Cadre सेवा में SSP बने हैं। System को स्वीकार करना होता है।
सविन ने CEO की गाड़ी शायद इसलिए IAS अभिनव शाह और अन्य अफसरों को भेज के मंगवानी चाही कि जिस काम के लिए गाड़ी सरकार से मिली है, वह सरकार के अहम कामकाज में ही इस्तेमाल नहीं हो रही। DM की बैठक में बिना किसी सूचना या वजह के न आना गंभीर माना जाता है। ये भी ध्यान में रखना चाहिए कि ऐसी तमाम मिसाल हैं जब कई IPS या IFS अफसर Batch के हिसाब से DM से वरिष्ठ होते हैं या हैं। IFS लेकिन DFO का जिम्मा संभाल रहे होते हैं जो एक जिले में कई होते हैं। इसको तूल दे के किसी CEO को कोई फायदा शायद ही होगा। राज्य सरकार और इसके प्रशासनिक अफसरों की ताकत और ज़िम्मेदारी कहीं अधिक और व्यापक होती है। केंद्र के अफसरों को उनके साथ तालमेल बनाना ही पड़ेगा। EGO और प्रतिष्ठा का मुद्दा बनाना उनको ही नुकसान देगा।
सेना के Generals (Army Commanders-Area Commanders-Core Commanders-Division Commanders) भी कई मर्तबा सचिवालय में CS से शिष्टाचार भेंट करते हैं। सेना और अपने अफसरों-जवानों की दिक्कतों को Civil-Military Liaison Meetings में उठाते हैं और समाधान पाते हैं। Army Commander का दर्जा Warrant of Precedence में CS से ऊपर होता है। संयोग की बात है कि CEO अंकिता उसी तनु जैन के Batch की है जो 3 साल पहले गढ़ी-प्रेमनगर Cantt में CEO थीं। वह भी Posting के आखिरी दौर में काफी विवादों में रही थीं। खास तौर पर प्रेमनगर में अमिताभ Textiles मिल की खरीद-फरोख्त और Land Use परिवर्तन के मुद्दे पर। उसी मामले के तूल पकड़ने के बाद तनु का तबादला हो गया था। भले तबादले की वजह प्रशासनिक बताई जाए।



