
Chetan Gurung
उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद यहाँ निजी विश्वविद्यालय और बड़े अस्पतालों की नर्सरी जहां-तहां दिखाई देती हैं। इसका यहाँ के लोगों के साथ ही आसपास के राज्यों के लोगों और युवाओं को फायदा भी मिला है और मिल रहा है। लोगों को कई बार ऐन मौके पर बेहतर ईलाज मिला और निरोगी हुए या फिर जान ही बच गई। युवाओं को बड़ी-बड़ी उच्च-तकनीकी और चिकित्सा शिक्षा की डिग्री मिल रही। सवाल न तो आज डिग्री सुलभ होने की और न ही 3 या 5 सितारा किस्म के अस्पतालों-Medical Colleges के खुलने और सुविधाएं मिलने की है। हकीकत ये है कि निजी विवि हो या फिर बड़े निजी अस्पताल, कई मामलों में लोगों की मजबूरियों का नाजायज फायदा उठाते नजर आए हैं। दोनों को ले के मुद्दे भी अलग-अलग हैं। निजी अस्पतालों में ईलाज के नाम पर अंतिम बूंद तक चूस लिए जाने का धंधा चल रहा तो निजी विवि में पढ़ाई से अधिक युवाओं में उच्छृंखलता को अधिक बढ़ावा मिलता दिख रहा। दोनों ही लोगों की मजबूरी बनी हुई है और इसका पूरा दोहन दोनों संस्थाओं से जुड़े मालिकान या प्रबंधन भरपूर कर रहे। कुछ अस्पताल तो लोगों की जिंदगी से भी खेल जा रहे हैं। राजधानी के एक अस्पताल में हाल ही में आग लगने से हुई एक मरीज की मौत इसकी ज्वलंत मिसाल है।

Panacea Hospital:आग लगने से मरीज की मौत के मामले में आरोपों के घेरे में
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Chetan Gurung
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संयोगवश मैं कुछ बड़े विवि और अस्पतालों-Medical Colleges के बारे में ठीक-ठाक जानता हूँ। साथ ही भीतर के System को भी। सच ये है कि कुछ को छोड़ के अधिकांश विवि या अस्पतालों की गुणवत्ता शिक्षा और ईलाज के मामलों में न तो स्तरीय हैं न ही माध्यम वर्ग के लिए माफिक हैं। सरकारी योजनाएँ न हों तो वे इन अस्पतालों में ईलाज कराना तो दूर घुसने की भी सोच नहीं पाएंगे। जो लोग निजी विवि में अपने बच्चे पढ़ा रहे हैं, उनमें से अधिकांश की घर की दशा छिन्न-भिन्न हो रही है। तुर्रा ये कि पढ़ाई पर लाखों खर्च करने के बाद कुछ लोगों को छोड़ अधिकांश को नौकरी या तो मामूली तनख्वाह पर मिल रही या फिर अच्छी या फिर छोटी नौकरियों के लिए भी धक्के खा रहे।
विश्वविद्यालयों का आलम भी बहुत हद तक नामी-गिरामी Schools सरीखे हो चुके हैं। वे अपने Students की प्रगति की Marketing या अपनी Branding जम के करते हैं। जो Students की अपनी मेहनत का नतीजा अधिक होता है। ये Schools जैसा मामला है। स्कूलों में बच्चों के अंक 10वीं और 12वीं की Board परीक्षाओं में जब 95 फीसदी से अधिक आते हैं तो प्रबंधन उनके नामों और तस्वीरों को अखबारों और Social Media में प्रमुखता से प्रकाशित कराते हैं। वे ये नहीं बताते कि उनके आधे से अधिक बच्चों के अंक प्रतिशत अगर पहले जमाने के UP या फिर Uttarakhand Board की अंक व्यवस्था के मुताबिक देखा जाए तो उनकी तृतीय श्रेणी भी मुश्किल से आ पाए। एक सच ये भी कि वे नवीं और 11वीं में ही पढ़ाई में कुछ हल्के बच्चों को Fail कर देते हैं। सिर्फ पढ़ाई में बहुत बेहतर को ही वे पास करते हैं।
मैं कुछ वरिष्ठ IAS-IPS अफसरों के बच्चों के बारे में जानता हूँ। वे देहरादून के नामी स्कूलों में पढ़ते थे। Board इम्तिहान में उन्होंने जबर्दस्त प्रदर्शन करते हुए खूब Marks कमाए। उनके Schools ने उनके प्रदर्शन पर अपने System की जम के Branding की। मैंने उन बच्चों के लाजवाब प्रदर्शन पर Schools की तारीफ की तो इन IAS-IPS अफसरों ने साफ लफ्जों में कहा कि ऐसा नहीं है कि सब कुछ Class में ही उनके बच्चों ने सीखा। वे दफ्तर से घर जाने के बाद रात 11-12 बजे तक खुद अपने बच्चों को पढ़ाते हैं। स्कूल की पढ़ाई के भरोसे रहें तो 80 फीसदी ही Marks आ पाते। मतलब ये कि स्कूलों से ज्यादा इन बच्चों के विलक्षण किस्म के माता-पिता की मेहनत बच्चों की कामयाबी के लिए अधिक जिम्मेदार थीं। निजी विवि में भी ऐसे ही विलक्षण प्रतिभा वाले बेहद मेहनती बच्चे जब जाते हैं तो जाहिर है कि वे अपने बूते उच्च-तकनीकी-चिकित्सा शिक्षा में भी शानदार प्रदर्शन करते हैं। बड़ी कंपनियों में पैकेज हासिल करते हैं। उनकी मेहनत की Marketing निजी विवि प्रबंधन अपने लिए खूब कर रहे।
अधिकांश बड़े और नामी निजी विवि पढ़ाई की गुणवत्ता से अधिक तो उसके यहाँ पढ़ रहे Students की आवारगी और गुंडई-उच्छृंखलता के लिए अधिक सुर्खियां बटोर रहे। इसकी कई मिसालें हैं। कुछ साल पहले मेरी एकदम सड़क के किनारे खड़ी कार को अपनी गाड़ी से टक्कर मार के कुछ लोग भाग खड़े हुए। Police और Transport Department ने तत्काल सक्रियता दिखाई और 2 दिन बाद ही वे दबोच लिए गए। सहारनपुर के वे जवान होते लड़के मसूरी रोड स्थित एक निजी विवि में पढ़ रहे थे। मेरी कार में 50 हजार रूपये का खर्च आया लेकिन वे 21 हजार ही दे के रोना-धोना कर के निकल लिए। मैंने पुलिस से आइंदा नशे में गाड़ी न चलाने की चेतावनी दिला के जाने दिया। हाल ही में देहरादून के जोहड़ी गाँव में रिटायर्ड ब्रिगेडियर की सनसनीखेज हत्या में शामिल आरोपियों में कुछ फिर उसी विवि के पूर्व छात्र बताए गए। प्रेमनगर के करीब स्थित एक विवि तो Students की हरकतों के कुकृत्यों के चलते बदनाम हो चुका है।
ऐसे ही प्रेमनगर से आगे जंगल-गाँव पार कर बने नामी निजी विवि के Students की हरकतों के किस्से भी सामने आते रहते हैं। कहने का मतलब ये है कि बचा कोई भी विवि नहीं है। किसी के अधिक और किसी के कम मामले सामने आते हैं या फिर अधिकांश मामले दबा दिए जाते हैं। बड़े-बड़े विज्ञापन छापने वाले अखबारों की हिम्मत नहीं कि वे उनके यहाँ हो रहे कांडों के बारे में चंद लाइन छाप सके। हैरानी तो तब होती है जब पुलिस केस होने पर भी उनके नामों की जगह सिर्फ एक निजी विवि लिखा जाता है। शिक्षा के ये कथित केन्द्रों का हाल ये है कि उनमें पढ़ाई से ज्यादा प्रचार की होड़ दिखती है। ऐसा कोई निजी विवि नहीं बचा है जो अपने यहाँ बड़े-बड़े कलाकारों-Star हिन्दी या पंजाबी Singers को बुला के प्रचार बटोरने से चूक रहे हों। उनकी सरकार और नौकरशाहों में भी पकड़ ख़ासी हो चुकी हैं। लिहाजा वे न System को इज्जत देते हैं न सरकार के आदेशों की परवाह ही करते हैं।
राजकीय शोक के आदेश भी वे ठेंगे पर रखते हैं। उनका कोई कुछ बिगाड़ भी नहीं पाता है। अधिकांश मालिकों की उत्तराखंड राज्य गठन से पहले की पृष्ठभूमि से अच्छी तरह वाकिफ हूँ। सच ये है कि राज्य बनने का स्वर्णिम सुख वे ही लूट रहे। कभी वे माफिया कहलाए जाते थे। पुलिस के दारोगा-तहसीलदार-SDM-ADM-छोटे-मोटे नेताओं के आगे-पीछे नाचा करते थे। अब पैसों और नौकरशाहों-मंत्रियों-विधायकों-राजनेताओं से दोस्ती और Media को बिछौना बनाने के दम पर संभ्रांत और रसूखदारों में शुमार हैं। वे वक्त पड़ने पर गधे को बाप बना लेंगे और जरूरत न हो तो System में बैठे आकाओं को भी नजर अंदाज करने से नहीं चूकते।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने ऐसों को एक बार ऐसा तगड़ा झटका दिया था कि उनके एक बारगी होश फाख्ता हो गए थे। उनको अपनी हैसियत याद आ गई थी। माफी मांग के और हाथ जोड़ के बच पाए थे। एक निजी विवि को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश को सामाजिक सरोकारों से कोई वास्ता नहीं है। वे बस मोटा माल पढ़ाई के नाम पर बटोर रहे। कभी कोई समाज सेवा की बात आती भी है तो वे सिर्फ प्रचार मिलने की कीमत पर ऐसा करते हैं। बड़ा फायदा न दिखाई दें या फिर नुकसान का अंदेशा न हो तो उनके मालिकानों का अंदाज मंत्रियों-नौकरशाहों से भी बड़ा हो जाता है। वे नौकरशाहों को भी निशाने पर ले लेते हैं। पूर्व में शराब,खनन और जमीन के धंधों से जुड़े अधिकांश विवि मालिकनों के इतिहास से पुराने वाशिंदे बखूबी वाकिफ हैं। उनके साथ कोई न कोई विवाद चिपकता भी रहता है। रसूख और पैसों की खनक के बूते वे बच निकलते हैं। उनसे किसी गरीब प्रतिभावान Students या बड़ी खेल प्रतियोगिता-खिलाड़ी की मदद के लिए कहा जाए तो कभी नहीं मानेंगे। हरिद्वार बाइपास रोड स्थित एक Coaching Institute भी इनसे जुदा नहीं है। वह भी प्रचार तक अधिक सीमित है।
अलबत्ता,राजधानी के एक विवि Graphic Era काफी हद तक अलग छवि और प्रतिष्ठा प्रदर्शित करते रहे हैं। निजी अनुभव पर कह रहा हूँ। इस विवि के मालिक डॉ कमल घनशाला को सामाजिक सरोकारों, प्रतिभावन खिलाड़ियों,शहीद सैनिक परिवारों और दैवीय आपदा के मारे परिवारों की मदद के लिए जाना जाता है। बाकी विवि इन मामलों में इकन्नी भी खर्च करते हों, इसकी मिसाल नहीं मिलती है। चोरी-छिपे करते हों तो कहा नहीं जा सकता है। कुछ के मालिकों के बारे में ये कुख्याति है कि वे अपने विवि में बड़े ओहदे संभाले हुए हैं लेकिन उनके लिए काला आखर भैंस बराबर है। अस्पतालों का आलम ये है कि इसमें भी अनेक Land Mafia और राजनेता घुसे हुए हैं। Covid काल में कई मालिकों ने क्या-क्या गुल खिलाए अनेक लोगों और सरकार को बाखूबी मालूम है। कुछ ने अपनी हरकतों के चलते मुकदमे तक झेले। विकासनगर के एक अस्पताल के मालिक पर एक वयोवृद्ध NRI महिला ने Fraud के आरोप लगाए। उसमें एक नेता भी शामिल होने के आरोप है।
विधानसभा के करीब स्थित एक अस्पताल में अव्यवस्था के चलते आग लगी और एक मरीज की जान चली गई। कई झुलस गए। ये आरोप भी सामने आ रहे कि एक बड़े सत्ताधारी का इस अस्पताल में हिस्सा है। इसके चलते अस्पताल के औपचारिक मालिक का कुछ बिगाड़ नहीं हो पा रहा। मसूरी रोड पर स्थित एक नामी अस्पताल का हाल ये है कि एक परिचित पूर्व सैनिक का उसके यहाँ लंबे समय तक ईलाज हुआ। टांग काटने की नौबत आई फिर जान का खतरा भी झलका। दूसरे अस्पताल में दिखाना शुरू किया तो वहाँ भी सिर्फ लूट-खसोट हुई। आखिरकार तीसरे अस्पताल (Graphic Era) में जा के उनकी जान बची और सुधार हुआ। अस्पतालों में कमाई का तरीका बहुत साधारण और सामान्य होता है। तमाम टेस्ट और फिर हर बार हजारों रुपयों की दवाइयाँ उनकी ही फार्मेसी से खरीदने की बाध्यता रख देते हैं। जिनकी कीमत इतनी अधिक होती है कि मध्यम तबके के लिए उनके खर्चों का बोझ उठा पाना मुमकिन नहीं होता है।
इसके बाद भी बड़ी बीमारी है तो उसके ठीक होने की कोई गारंटी नहीं होती है। ईलाज जरूर अच्छा होगा, अगर आपके रिश्ते प्रबंधन से अच्छे हैं तो। Graphic Era-Himalayan Hospital और Synergy के मालिकों से अच्छा परिचय है और मुझे ये कहने में हिचक नहीं है कि मुझको इसका लाभ हमेशा तब मिला है, जब ईलाज के लिए वहाँ गए। मेरा निजी अनुभव और राय है कि सरकार को निजी विवि और अस्पतालों-Medical Colleges पर लगाम कसनी होगी। चाहे कोई भी कदम उठाना पड़े। इसका फायदा उसको जरूर मिलेगा। अवाम को राहत मिलेगी।



