
Chetan Gurung
3 दिन पहले ही मुझे राणा जी (जसपाल के पिता और पूर्व राज्यमंत्री) का रात घिरते-घिरते फोन आया था। उन्होंने बताया कि जसपाल दिल्ली के अस्पताल में दिल का दौरा पड़ने के चलते भर्ती है। खतरे की बात नहीं है। स्टेंट पड़ा है। जल्दी छुट्टी मिल जाएगी। मुझे झटका लगा कि ये कब हुआ! फिर राणा जी से ही मालूम चला कि भाभी जी (जसपाल की माँ) भी ICU में हैं। राणा जी की हस्ती का अंदाज अधिकांश लोग उनके सरल-सामान्य भाव के चलते लगा नहीं पाते। वह रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के समधी हैं। उनकी बेटी सुषमा का ब्याह राजनाथ के बेटे पंकज से हुआ है। खैर आज सुबह मनहूस खबर मिली कि जसपाल ने एक और हृदयाघात के बाद अस्पताल में अंतिम सांस ली। मुझे मानो बहुत बड़ा झटका लगा। इसकी वजह थी। मेरे लिए वह प्रिय छोटा भाई अधिक था। सितारा निशानेबाज या विख्यात प्रशिक्षक से अधिक। 3 दशक से अधिक से उसको और पूरे राणा परिवार से गहरा नाता रहा है। जसपाल की शादी में मैं भी था।

जसपाल की पत्नी रीना और पुत्र युवराज को धैर्य बँधाते CM पुष्कर सिंह धामी
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CM पुष्कर सिंह धामी ने जसपाल के पिता नारायण सिंह राणा को सांत्वना दी। विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूड़ी भी साथ थीं
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सुबह राजू (जसपाल के चाचा राजेंद्र राणा) से मैंने फोन पर पूछा तो उन्होंने बताया कि सुबह 4 बजे फिर दिल पर हमला हुआ जिसको जसपाल सहन नहीं कर सका। पहला Attack जसपाल को कुछ दिन पहले ही तब पड़ा था, जब वह म्यूनिख (जर्मनी) World Cup Shooting Championship से विमान में लौट रहे थे। उनको विमान के Land होते ही Max Super Speciality Hospital भर्ती कराया गया था। जसपाल को घर-परिवार और अपने खास लोग जस्सु पुकारते थे। मैं भी कभी पूरा नाम तो अधिकांश मौको पर निक नेम लिया करता था। हिरोशिमा में उसने जब सेंटर फायर पिस्टल में Gold जीता था तो मुझसे मिलने आया था। पिता और मेडल के साथ। तब वह 18 साल का ही था। बात 1994 की है।
2006 के दोहा Asiad में भी उसने कमाल का प्रदर्शन कर दिखते हुए 2 Gold और 1 Silver Medal जीत के भारत की प्रतिष्ठा बचाई थी। जसपाल के बाद देहरादून के ही अभिनव बिंद्रा राइफल निशानेबाजी में छाए और बीजिंग Olympics (2008) में Gold जीता। इसके बावजूद ये कहने में कोई हिचक नहीं कि भारत में अगर निशानेबाजी को चमक और नाम किसी के कारण मिला तो वह जसपाल ही थे। आकर्षक और खूबसूरत नौजवान जसपाल का वह दौर भी था, जब उसके पीछे प्रशंसकों और उसमें भी लड़कियों की ख़ासी तादाद होती थी। जसपाल के पास ONGC की शानदार नौकरी भी थी। अचानक राजनीति का चस्का ऐसा चढ़ा कि उत्तराखंड गठन के बाद वह लोकसभा चुनाव भी लड़े। स्वर्ण पर निशाना लगाने वाला नौजवान सियासत में पिछड़ गया। फिर पलट के उसकी तरफ नहीं देखा।
खिलाड़ी के तौर पर शीर्ष पर रहने के बावजूद जस्सु ने निशानेबाजी को छोड़ दिया। काफी समय बाद फिर प्रशिक्षण शुरू किया। कई बड़े और Asian Games-World Cup और फिर पिछले Paris Olympics में पदक विजेता निकाले। मनु भाखर ने Paris में 2 Bronze Medla जीते तो उसकी इस लाजवाब कामयाबी के लिए जसपाल के सख्त और मेहनती प्रशिक्षण को भरपूर श्रेय दिया गया। बतौर खिलाड़ी जसपाल बेहद मेहनती और लगन का धनी था तो प्रशिक्षक की भूमिका में वह अत्यंत सख्त और अनुशासन पसंद की प्रतिष्ठा रखते थे। ये विडम्बना है कि इतने बड़े नाम और पद्मश्री-अर्जुन अवार्ड से अलंकृत और रक्षा मंत्री के बेहद करीबी रिश्तेदार होने के बावजूद जसपाल के पास नियमित आय का कोई साधन नहीं था। नौकरी न होने के चलते उसका दर्द कभी-कभी झलकता भी था।
जसपाल को केंद्रीय खेल मंत्री रहीं उमा भारती का बेहद लाडला भी माना जाता था। उत्तराखंड राज्य बना तो उसने मेरे कहने पर सीधे खेल मंत्री उमा से बात कर उत्तराखंड Table Tennis संघ की मान्यता Federation (TTFI) से दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी। मेरा जस्सु से सुख-दुख का नाता रहा। दशकों पहले मालवीय नगर (नई दिल्ली) में जब राणा परिवार रहा करता था तो मैं तब भी उस परिवार में जाया करता था। मझौन (पौंधा-देहरादून) भी गया और इन्दिरा पुरम (MDDA Colony-कांवली रोड) भी जाता रहा।
जसपाल की तकदीर में लिखा था शायद, इसलिए उसकी 2 शादियाँ हुईं। पहली पत्नी रीना थी। फिर कुछ साल पहले दूसरी शादी हुई। Paris में जब मनु भाखर ने Record प्रदर्शन किया तो जसपाल ने मुझे फोन कर के कहा था,`भैया मैं खुश तो हूँ लेकिन संतुष्ट नहीं। मनु की तकदीर थोड़ा भी साथ देती तो कम से कम एक पदक का रंग बदल सकता था।’ पहले देश में राजा रणधीर सिंह का राइफल निशानेबाजी में बहुत नाम था। उनका भी हाल ही में देहावसान हुआ। फिर भी ये कहा जा सकता है कि निशानेबाजी सरीखे महंगे खेल को Glamour और लोकप्रियता के रंग में सिर्फ जसपाल ने भी भरा।
जौनसार-बावर से सटे गाँव जौनपुर गाँव के जसपाल की NRAI (राइफल शूटिंग फेडरेशन) से खास नहीं बनती थी। वह खरा-खरा और बेधड़क साफ बोलना पसंद करने वालों में था। चिकनी-चुपड़ी बातें कर अपना उल्लू सीधा करना उसको नहीं आता था। मुझे कई बार कहा कि भैया अपने बेटे को शूटिंग में डालो। उसके हैंड्स अच्छे हैं। मेरे बड़े भाई मेख गुरुंग की जब कारगिल युद्ध में 1999 में शहादत हुई तो भी शोक जतलाने और श्रद्धांजलि अर्पित करने घर आया था। हम फोन पर बातें किया करते थे। शूटिंग और उत्तराखंड खेलों के विकास पर उसके पास कई योजनाएँ और Ideas थे। Indian Sports का वह असल महानायक था।
आज जसपाल के निधन की सदमा देने वाली खबर जिसको भी मिली वह हतप्रभ था। CM पुष्कर सिंह धामी शोक जताने और श्रद्धांजलि अर्पित करने पहुंचे। विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूड़ी,मंत्री खजानदास समेत तमाम बड़े नाम-ओहदे वाले भी श्रद्धांजलि देने उनके आवास आए। सभी ने एक सुर में जसपाल के खेलों में अहम योगदान को याद किया भावुक नजर आए। जसपाल के नाम पर सिर्फ Stadium का नामकरण ही नहीं होना चाहिए बल्कि कोई बड़ा सरकारी सम्मान भी घोषित किया जाना चाहिए। जो प्रतिभावान श्रेष्ठ खिलाड़ी को उसकी उपलब्धियों के आधार पर दिया जाए। वह असल उत्तरखंडी था। दिल और भावनाओं से।
मुझे याद है कि हैदराबाद National Games में आंध्र प्रदेश सरकार ने स्वर्ण पदक जीतने पर 5 लाख रुपए का पुरस्कार अपने राज्य से खेलने वाले खिलाड़ियों के लिए घोषित किया था। ये खेल शायद 25 साल पहले हुए थे। देश के कई बड़े खिलाड़ी इतनी बड़ी इनामी राशि के फेर में अपना प्रदेश छोड़ आंध्र प्रदेश से खेले थे। जसपाल को भी ये पेशकश खास तौर पर आई। उसने साफ मना करते हुए नए-नवेले अपने राज्य का ही प्रतिनिधित्व करने का फैसला किया। औ
र जानते हैं, उसका प्रदर्शन क्या रहा? हैदराबाद में उसने अकेले 5 Gold Medal उत्तराखंड के लिए जीते। यानि उस दौर में 25 लाख रूपये। तब राजपुर रोड पर 5-7 लाख रूपये में एक बीघा जमीन मिल जाया करती थी। बदले में जसपाल को तब की राज्य सरकार से चवन्नी भी नहीं मिली। इसकी जसपाल ने कभी शिकवा या शिकायत नहीं की। वह सच्चा हिमालय पुत्र जो था। उत्तराखंड खेल जगत का देवदूत। मेरी श्रद्धांजलि..बहुत याद आओगे जस्सु…



