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अलविदा जनरल साहब!उत्तराखंड BJP के अजातशत्रु हो गए थे BCK

The Corner View

Chetan Gurung

कड़क अंदाज,मितभाषी (मितव्ययी भी),फौरन नतीजों की चाह रखने और साथ ही आकर्षक तलवारी मूंछों से उत्तराखंड BJP में अहम स्थान रखने वाले पूर्व मुख्यमंत्री,केंद्र में राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और मंत्री रहे भुंवनचन्द्र खंडूड़ी को भारी मन से दिवंगत लिखते समय उनसे जुड़ी तमाम पुरानी यादों और अनुभवों को पेश करना चाह रहा हूँ। एक अन्य अभिन्न मित्र जो दिवंगत हो गए हैं, प्रकाश पंत को भी याद करना चाहूँगा, जो उनके मंत्रिमंडल में थे और हम जब आपस में बात कर रहे होते थे,तो जनरल साहब (मैंने सदा खंडूड़ी जी को जनरल साहब ही बोलना पसंद किया) के रुआबी अंदाज और एक चाय के प्रसिद्ध विज्ञापन की तर्ज पर वह उनको Lipton Tiger कहना पसंद करते थे। वाकई वह Tiger थे भी। कभी हार न मानने वाले। लंबे समय से बीमारी से जंग करते हुए लेकिन आज BCK अपने घर-परिवार से जुड़े लोगों के साथ ही अपने प्रशंसकों के भारी हुजूम को दुख-शोक देते हुए ब्रह्मलोक रवाना हो गए। जनरल BCK के विपक्षी और विरोधी भी उनसे मौन युद्ध तो करते थे लेकिन उनका सम्मान भी निजी तौर पर बहुत किया करते थे। उनकी एक अलग और विशिष्ट जगह थी, जो खाली हो गई और शायद भर भी नहीं पाएगी।

CM पुष्कर सिंह धामी अस्पताल जा के BC खंडूड़ी से मिले थे (File Foto)

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मैं उनको पहली बार देहरादून के घंटाघर के करीब उन दिनों स्थित PWD Guest House (आज यहाँ Kumar Sweet Shop वाला विशाल MDDA Complex है) में मिला था। साल 1991 की बात होगी। वह पहली बार लोकसभा सदस्य बने थे। Core of Engineers से Retire होते ही BJP ने उनको हाथों-हाथ लेते हुए संसद भेजने का मन बना लिया था। पहली बार इतना बड़ा सैन्याधिकारी सांसद बना था। फिर हम दोनों मिलते रहे। कभी राजनीतिक-सामाजिक आयोजनों में तो कभी Interview के दौरान। मैं जिस अखबार `अमर उजाला’ में था, उसकी तब तूती बोला करती थी। लिहाजा इस अखबार का Reporter होने के नाते हमारा फर्ज भी बनता था कि कुछ बड़ी और Exclusive खबरें निकाल लाएँ। इसी कोशिश में उनसे मिलते-मिलते ही रिश्ते पत्रकार-राजनेता से अधिक जुदा किस्म के हुए।

उत्तराखंड आंदोलन के दौरान BCK भी खूब सक्रिय रहे। जब उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ तो संभावित CM के दावेदारों में उनका नाम भी भगत सिंह कोश्यारी,रमेश पोखरियाल निशंक,केदार सिंह फोनिया और नित्यानन्द स्वामी के साथ प्रमुखता से लिया जा रहा था। बाजी अलबत्ता,स्वामी के हाथ लगी। BJP में आपसी बिल्ली लड़ाई का नतीजा रहा कि अलग राज्य देने के बावजूद पार्टी साल-2002 में पहले ही आम चुनाव में मरियल-हतोत्साहित Congress के हाथों मात खा के 5 साल तक सत्ता से दूर हो गई। इस नतीजे की उम्मीद खुद विजेता दल को भी नहीं थी। साल-2007 में BJP ने वापसी के लिए ज़ोर लगाया। खंडूड़ी एक बार फिर कोश्यारी के साथ CM दावेदार के तौर पर उभरे हुए थे। चुनाव से कुछ हफ्ते पहले की एक रात की बात है। मैं दफ्तर में था। शायद 9 बज रहे थे। उनके बेहद करीबी और विश्वासपात्र उमेश अग्रवाल (BJP के महानगर अध्यक्ष सिद्धार्थ अग्रवाल के मरहूम पिता) का फोन आया कि जनरल साहब अभी मिलना चाहते हैं।

Chetan Gurung

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आम तौर पर मैं रात 10-11 बजे तक दफ्तर में रहता था लेकिन उस दिन एक शादी में जाना था तो मैं जल्दी निकलने वाला था। खैर,मैं थोड़ी देर बाद उनसे मिलने धामावाला में उमेश के होटल में पहुंचा। ये जानना चाहता था कि वह क्यों अचानक मिलना चाह रहे। उमेश मुझे अपने साथ होटल की पहली मंजिल के एक कमरे में ले गए। जनरल साहब कुर्सी पर अनिल गोयल (BJP नेता और बड़े कारोबारी) के साथ खामोशी के साथ बैठे थे। मुझे उनके साथ बिठा के उमेश-अनिल Room से बाहर चले गए। कुछ देर की खामोशी के बाद मैंने ही पूछा कि बताइये जनरल साहब। किस लिए याद किया? उन्होंने कुछ पल की खामोशी के बाद कहा,मुझको चुनाव में आपकी मदद की जरूरत है। उन्होंने बताया कि कैसी मदद चाहिए। उस बाबत खुलासा करना उचित नहीं रहेगा लेकिन प्रचार के दौरान मैं कभी Congress के तो कभी BJP के दिग्गजों के साथ हवाई दौरों पर रहा। अलबत्ता,सबसे अधिक BCK के साथ प्रचार अभियान में गया। पहाड़ों में तब एक जगह मुझे तीरथ सिंह रावत (जो उनके बड़े भरोसेमंद थे और त्रिवेन्द्र सिंह रावत के हटाए जाने के बाद CM भी बने) और पहली बार दुबली-पतली College Girl किस्म की दीप्ति रावत (मौजूदा BJP प्रदेश महामंत्री) मिली थीं।

BCK आखिर BJP के सत्ता में आते ही सभी दावेदारों को निराश करते हुए CM बने। ये बात दीगर है कि वह एक पल के लिए भी चैन से नहीं बैठ पाए। विरोधी उनका जीना लगातार मुहाल किए रहे। उनके साथ मेरी करीबी का फायदा `अमर उजाला’ को वाकई खूब हुआ। जो अहसान BCK ने मेरे कहने पर किए,उसका खुलासा करना कोई जुर्म नहीं है। उनके शपथ ग्रहण के कुछ दिन बाद ही `अमर उजाला’ की एक टीम NOIDA से देहरादून आ गई। विज्ञापन के लिए। अखबार के बड़े-बड़े ओहदेदार थे उसमें। मुझसे मिले। धंधे की बात की। मैंने Mobile पर नए-नए मुख्यमंत्री से बात की और अपने विज्ञापन वालों की इच्छा का खुलासा किया। पल भर में उमेश का फोन आया। थोड़ी देर बाद Full Page व्यावसायिक विज्ञापन भेज दिया गया। गैर सरकारी।

अगले दिन ये विज्ञापन बाजार में तहलका मचाने के लिए काफी था। सभी प्रतिद्वंद्वी अखबार इस विज्ञापन से हिल गए थे जो बहुत मोटी रकम वाला था। ये रहस्य किसी के पल्ले नहीं पड़ा कि विज्ञापन आखिर किसने जारी किया। किसी अनाम सी समिति के नाम से विज्ञापन जारी हुआ था। हमारा काम लेकिन हो गया था। फिर दुनिया में आर्थिक मंदी आई तो मेरे अखबार की भी चूलें हिलीं। ऊपर से मुझे फोन आया कि राज्य सरकार में काफी मोटा भुगतान सालों से अटका हआ है। विज्ञापन वालों के बस की बात नहीं कि उनको निकाला जाए। आप मदद कर उनको निकलवा दें। अखबार को राहत मिल सकेगी। मैंने फिर जनरल साहब से मुलाक़ात कर बरसों से लंबित लाखों के भुगतान पर बात की। उन्होंने तत्काल अपने सचिव प्रभात सारंगी को भुगतान कराने के आदेश दिए। शाम तक सचिवों-प्रमुख सचिवों के फोन मुझको आने लगे। उन्होंने सारंगी के जरिये मिले CM के निर्देश का जिक्र करते हुए कहा कि आपका भुगतान तो कर दें लेकिन क्या करें,Budget नहीं है।

इसका समाधान प्रमुख सचिव (वित्त) आलोक कुमार जैन (मुख्य सचिव बन के रिटायर हुए) ने निकाला। उनसे मेरे बेहतरीन रिश्ते थे। जो आज भी हैं। उन्होंने कहा कि विभागों के पास भले पैसा नहीं है लेकिन सूचना विभाग के पास इफ़रात में पैसा है। वह सभी महकमों के लंबित भुगतान कर दे। अनुपूरक बजट पास होने पर सूचना विभाग को संबन्धित महकमे पैसा लौटा देंगे। मैंने ये बात सारंगी को बताई। उन्होंने फौरन उस वक्त के ED (Information) सुवर्द्धन को इस पर अमल करने के लिए कहा। काम हो गया। वह जब पहली बार CM बने तो उमेश ने मुझसे उनका इंटरव्यू करने के लिए गुजारिश के अंदाज में कहा। मैंने कहा ठीक है लेकिन सवाल कुछ टेढ़े भी होंगे। बीजापुर VVIP गेस्ट हाउस से जुड़े Safe House में अगले दिन सुबह Interview होना था। शाम तक प्रमुख सचिवों और सचिवों के फोन आने लगे कि क्या आप मुख्यमंत्री का इंटरव्यू करने वाले हैं? मैंने सवाल का कारण पूछा तो बताया गया कि CMO से उनसे महकमों की प्रमुख रिपोर्ट मांगी गई है।

Interview के लिए मैं सुबह कुछ मिनट पहले पहुँच गया था। कुछ मंत्री और Intelligence Chief सुभाष जोशी भी पहुंचे हुए थे। सवाल-जवाब के लिए 40 Minutes तय थे लेकिन मैंने 10 मिनट में काम खत्म किया। इस बीच एक बार चाय भी पी और निकल गया। मुझको महकमों के Data से कोई वास्ता नहीं था। न ही उनमें मेरी कोई दिलचस्पी थी। मुझे अच्छे से समझ आ गया था कि General BCK कोई भी काम पूरी तैयारी के साथ करना पसंद करते हैं। ये भी कि वह हर काम को पूरी गंभीरता से करना पसंद करते हैं। वह जल्दी से लोगों पर भरोसा कर लेते थे। इसका उनको नुक्सान भी हुआ। एक रात कुछ जनरल विरोधी विधायकों ने मुझे फोन किया कि वे दिल्ली पहुंचे हुए हैं। आला कमान से मिल रहे। मुख्यमंत्री हटाने के लिए। लगभग 28 विधायक हैं। मैंने इस पर प्रतिक्रिया के लिए BCK को उसी वक्त फोन किया। उन्होंने अनभिज्ञता जताई और मालूम कर के बताऊंगा कहा। 5-7 मिनट बाद उनकी कॉल आई। छूटते ही कहा। आपकी रिपोर्ट गलत है। सभी विधायक क्षेत्र में हैं। अगले दिन लेकिन अखबार में मैंने बड़ी बगावत की खबर छाप दी। तब लोकसभा चुनाव में BJP सभी 5 सीट भी हार चुकी थी। इतनी बड़ी बगावत की उनके पास भनक तक नहीं थी।

उनके शक्तिशाली विरोधी एक हो चुके थे और लोकसभा चुनाव में सभी सीटें BJP उनके चलते ही हारी थी। ऐसे खराब Record और बगावत के बाद High Command के पास BCK को बदलने के अलावा कोई और विकल्प नहीं रह गया था। उसने निशंक को CM कुर्सी सौंप दी। मेहनत भले कोश्यारी की थी। सांडों की लड़ाई में खेत का नुक्सान होता है,एक कहावत है। ये Lieutenant General (Ret) तेजपाल सिंह रावत पर फिट बैठी। वह Congress छोड़ के आए थे। खंडूड़ी उनकी ही धूमाकोट सीट से लड़ के विधायक बने थे। हालात माकूल होते तो TPS न सिर्फ MP बल्कि केंद्र में मंत्री बनते। मुझको इसके बारे में तफसील से जानकारी है। इस पर फिर कभी लिखुंगा। वह जब दुबारा मुख्यमंत्री बने तो मुझे बुलाया। सचिवालय में भेंट हुई। दोपहर का वक्त था। उन्होंने दो पहलुओं पर खास तौर पर बात की। एक तो मंत्रियों और नौकरशाही पर। दूसरा Transfer Policy पर। आला कमान ने उनको पूरी छूट दी थी कि वह कुछ भी कर सकते हैं। बस सरकार फिर चाहिए। ये अतिश्योक्ति मान सकते हैं कि मुझसे लिए गए सुझावों पर अमल हुआ।

जिस सचिव और मंत्री से खास महकमे हटाने को कहा और उनकी जगह जिनके नाम सुझाए, जनरल साहब ने वैसा ही किया। उसी दौरान तबादला नीति का जिक्र हुआ। अपने सचिव दिलीप कुमार कोटिया को उसी वक्त बुला के इसको तत्काल अमल में लाने के निर्देश दिए। वही नीति आज तक चल रही। BCK के पास ठोस और काबिल Intelligence Network नहीं था, ये कहा जा सकता है। उनका साल-2012 विधानसभा चुनाव में कोटद्वार सीट का चयन सही नहीं था। उनके पास अन्य कई बेहतर विकल्प थे। उनके पास रिपोर्ट भी सही नहीं आ रही थी। दिल्ली से आए कुछ पत्रकारों ने मुझसे चुनाव का माहौल जानना चाहा तो उनको मैंने कोटद्वार जाने के लिए कहा। हर एक ने मुझे ये कहा कि चुनाव अजीब लग रहा। वे लोगों से मिल रहे और साफ लग रहा कि जनरल खंडूड़ी चुनाव हार रहे। मुझे इसका एहसास था। इसलिए कुछ न बोल के मैंने बाहरी पत्रकारों को सीधे खुद कोटद्वार जाने के लिए कहा था। तब नारा चल रहा था,`खंडूड़ी है जरूरी’। BJP में मौजूद उनके विरोधियों ने उनको निबटा दिया। न कि Congress ने।

चुनाव के दिनों ही एक दिन मैं सचिवालय में प्रमुख सचिव राकेश शर्मा के दफ्तर में था। जनरल साहब की जीत की महक उड़ी हुई थी। उनके एक बेहद वफादार भी राकेश शर्मा के दफ्तर में मुझे देख मुस्कुराते हुए घुसे। मुझसे आत्मविश्वास के साथ पूछा,`क्या रिपोर्ट है चुनाव की? मैंने कहा,`टक्कर है लेकिन जनरल साहब चुनाव हार रहे’।  वह मज़ाक समझ कर हँसे और कहा,`हम कम से कम 12 हजार वोटों से कोटद्वार जीत रहे’। राकेश शर्मा ने उनसे कहा कि ये सही कह रहे हैं। उन्होंने मेरी बातों और समीकरण,हालातों पर इत्तफाक जताया। तब जा के उस वफादार साथी को कुछ खटका लगा। वह तुरंत काम छोड़ दफ्तर से निकल गए। फिर चुनाव के कई हफ्तों बाद दिखाई दिए। जनरल साहब तकरीबन साढ़े चार हजार के अंतर से चुनाव गंवा बैठे थे।

Congress ने सिर्फ 1 सीट अधिक जीत के सरकार बनाने का हक पाया। खंडूड़ी जीत गए होते तो BJP की सरकार उनकी ही अगुवाई में बनती। उनके आसपास मालिशिए या स्वार्थी लोग अधिक जुट गए थे। उन्होंने उनकी नाव डुबो डाली। BCK बाहर से सख्त इंसान थे लेकिन मानवीय गुणों से भरपूर थे। मेरे पिता का साल-2007 में लंबे ईलाज के बाद ब्रेन हेमरेज से निधन हुआ था। उन्होंने ईलाज के दौरान लगातार खुद नजर रखी। मेरे से फोन पर हमेशा कहा,फिक्र मत करना ठीक हो जाएंगे। ईलाज में कमी नहीं रहेगी। वह देखने भी आए थे। निधन पर शोक जताने घर भी आए। पत्रकारों के लिए उनमें संवेदनाएँ भरपूर थीं। साल-2007 में मैंने उनसे गुजारिश की कि पत्रकारों की माली हालत और उनके बच्चों की मदद की खातिर Club को 3 करोड़ रूपये का अनुदान दिया जाए। मैं पहले 1 करोड़ रूपये मांगने वाला था। प्रमुख सचिव (वित्त) आलोक जैन ने मेरी सोच को देख के कहा कि आप 5 करोड़ रूपये मांगिए। मिल जाएंगे। वित्त विभाग कोई अड़चन नहीं लगाएगा। मैंने हिचकते हुए 3 करोड़ रूपये की इमदाद मांगी थी। आज से 19 साल पहले इस रकम की अहमियत समझी जा सकती है।

मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुभाष कुमार ने कुछ दिन बाद मुझे फोन कर के कहा कि 3 करोड़ रूपये मंजूर कर दिए हैं। CM साहब खुद Press Conference कर के इसकी घोषणा करेंगे। ऐसा ही हुआ भी। कुछ पत्रकार हालांकि इसका भी विरोध करने लगे थे कि Club को इतना पैसा क्यों दिया जा रहा। तब मैं Club का President हुआ करता था। इस Budget के प्रस्ताव को विधानसभा से भी पास करा दिया गया था। ये पैसा क्यों नहीं UPC के खाते में नहीं आया, इसकी अलग ही कहानी है। मेरे कार्यकाल पूरा करने के बाद क्लब के नए अध्यक्ष और सचिव इस पैसे को सरकारी खजाने से निकालने की कोशिश करने के बजाए आपस में ही टकरा गए। उनके झगड़े के चलते फिर क्लब दशक भर तक बंद रहा। पैसे का कोई अता-पता नहीं। जनरल BCK से जुड़ी और भी तमाम अहम यादें हैं। जनरल भुवन के प्रशंसक भले सभी जाति और तबकों में थे लेकिन इसमें शक नहीं कि वह उत्तराखंड और खास तौर पर गढ़वाल के सबसे बड़े ब्राह्मण नेता बन के उभरे थे।

आज भी BJP के पास उनकी टक्कर का ब्राह्मण चेहरा नहीं है। ये बात अलग है कि BCK नहीं चाहते थे कि उनको जातीय नेता के दायरे में बांधा जाए। उनकी बेटी ऋतु भूषण खंडूड़ी और बेटा मनीष खंडूड़ी भी सियासत में हैं। दोनों में कौन पिता की विरासत को संभाल के आगे बढ़ा पाते हैं, ये देखना होगा। ऋतु विधानसभा अध्यक्ष हैं। गढ़वाल में पिता के बूते प्रमुख ब्राह्मण चेहरा है। मनीष Congress में अभी भी ठिकाना तलाश रहे हैं। BCK की खास बात ये है कि बाद में विरोधी भी उनका बहुत सम्मान करने लगे थे। CM पुष्कर सिंह धामी ऐसा कोई अहम वक्त नहीं होता, जब उनका आशीर्वाद लेने वसंत विहार स्थित उनके आवास न गए हों।

पुष्कर की राय और सोच किसी जमाने में उनसे कतई नहीं मिलती थी। वह कोश्यारी (महाराष्ट्र के पूर्व Governor-उत्तराखंड के पूर्व CM) के मरजीवड़ों में शुमार हुआ करते थे। एक और गुरु भाई और पूर्व CM त्रिवेन्द्र सिंह रावत के साथ। जनरल साहब पर खुद से जुड़ी यादों को लिखने बैठूँ तो ग्रंथ बन जाए। फिलहाल, उनको श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए ये कहना चाहूँगा कि सियासत और जिंदगी के अंतिम दौर में वह अजातशत्रु हो गए थे। सभी के बराबर रूप से सम्माननीय हो चुके थे। उनके जैसा शख्स जल्दी से नहीं दिखाई देगा।

 

 

 

 

 

 

 

 

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