
Chetan Gurung
देहरादून:उत्तराखंड के चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं वन मंत्री सुबोध उनियाल ने वन संरक्षण और पर्वतीय लोगों की समृद्धि को एक-दूसरे का पूरक करार देते हुए कहा कि स्थानीय लोगों की सहभागिता के बिना वन संरक्षण की कोशिशें सफल नहीं हो सकती हैं। लोगों की आजीविका को भी प्राथमिकता देनी होगी।
ग्राफिक एरा डीम्ड यूनिवर्सिटी में पर्वतीय क्षेत्रों की पर्यावरणीय चुनौतियां विषय पर सम्मेलन को बतौर मुख्य अतिथि सुबोध ने कहा कि ऐसी जनहितैषी नीतियां तैयार करने की जरूरत है, जो वन संरक्षण के साथ स्थानीय लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाएं। भूमि की उत्पादकता बढ़ाने और आधुनिक तकनीक और उन्नत उपकरणों के उपयोग पर जोर देना होगा।
मंत्री ने कहा कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तकनीकी नवाचार के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर प्रबंधन किया जा सकता है। कुलपति प्रो. नरपिंदर सिंह ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ी चुनौतियों में से एक कार्बन फुटप्रिंट से संबंधित सटीक आंकड़ों का अभाव है। उन्होंने कहा कि जब तक कार्बन उत्सर्जन और पर्यावरण पर उसके प्रभाव से जुड़े विश्वसनीय आंकड़े उपलब्ध नहीं होंगे, तब तक प्रभावी नीतियां और समाधान तैयार करना चुनौतीपूर्ण रहेगा।
ग्राफिक एरा डीम्ड यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर हिमालयन स्टडीज के चेयर प्रोफेसर एवं HNBGU के पूर्व कुलपति प्रो. SP सिंह ने कहा कि उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों में वनाग्नि और मानव-वन्यजीव संघर्ष गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों के रूप में उभर रहे हैं। वनाग्नि के प्रभावी प्रबंधन के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना और मानव-वन्यजीव संघर्ष के समाधान में स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है।
यूकॉस्ट के एमेरिटस साइंटिस्ट डॉ.GCS नेगी ने कहा कि उत्तराखंड में वन पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण और उसके लाभों को स्थानीय लोगों तक पहुंचाने में वन पंचायतों की महत्वपूर्ण भूमिका है। वन पंचायतों को सशक्त बनाकर प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर प्रबंधन और ग्रामीण आजीविका को सुद्रण किया जा सकता है। सम्मेलन का आयोजन ग्राफिक एरा डीम्ड यूनिवर्सिटी के एनवायरनमेंटल साइंस डिपार्टमेंट ने एप्रोप्रिएट टेक्नोलॉजी इंडिया के सहयोग से किया। सम्मेलन में प्रो वीसी डा. संतोष S सर्राफ, डिपार्टमेंट हेड डा. प्रतिभा नैथानी मौजूद रहे।



