थोड़ा सा सियासी हो जाए!!फिर से `पुष्कर’ ही परम सहारा!मोदी-शाह के ख्वाबों को साकार करने में मंत्री बेबस!Cabinet Reshuffle की दरकार:नौकरशाही में तो कस दिए काफी कस-बल

Chetan Gurung
विधानसभा चुनाव के लिए 1 साल का अरसा रह गया है लेकिन मंत्रियों से BJP और आला कमान को उम्मीद न होनी चाहिए न होगी। 4 साल सरकार के गुजरने वाले हैं और एक बार फिर साल-2022 की तरह सिर्फ और सिर्फ CM पुष्कर सिंह धामी ही BJP की सरकार को तख्त में लाने के अकेले हौसलामंद चेहरा हैं। PM नरेंद्र मोदी और HM अमित शाह की हर रणनीति को वह अंजाम तक पहुंचा रहे। दोनों असल आला कमान को माफिक आने-भाने वाली मुफीद योजनाएँ-कानून-कदम उठाने में PSD ने देश भर के BJP शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों में खुद को मीलों आगे किया हुआ है। सियासी विश्लेषक सिर्फ एक निष्कर्ष पर सामान्य सोच रखते नजर आते हैं। मंत्रिमंडल में फेरबदल या फिर कुछ को हटा के कुछ को ला के और कुछ के मंत्रालय बदल के सरकार को ताजा और चमकदार चेहरा दिया जाए। पुष्कर को उनकी पसंद के नए मंत्री दिए जाएँ। नौकरशाही में उन्होंने काफी हद तक कईयों के कस-बल दिए हैं लेकिन मंत्रिमंडल अब उनको उनकी पसंद का और अवाम के अधिक करीब का सौंपा जाए।

CM Pushkar Singh Dhami को PM Narendra Modi के साथ ही Union Home Minister Amit Shah (Right) के भी बेहद खासमखास में शुमार किया जाता है
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साल-2022 का विधानसभा चुनाव मोदी-शाह के ताकतवर साए में पुष्कर ही BJP को ना-मुमकिन से माहौल में जिता कर लाए थे। खुद BJP और उसके स्वयंभू सरदार मानने को राजी नहीं थे कि उनकी सरकार आ सकती है। न राज्य का राजनीतिक इतिहास इसकी गवाही दे रहा था न ही TSR-1,2 की सरकार का Record इसके लिए राजी दिख रहा था। मोदी और शाह ने तब सियासी जगत को चौंकाते हुए PSD की तुरुप चाल चली थी। जो कभी Deputy Minister तक नहीं रहा हो, उसको सीधा सरकार की कमान सौंप दी थी। 8 महीने तब चुनाव के लिए रह गए थे। पुष्कर ने अपनी मेहनत-लगन-संकल्प और रात-दिन को एक कर के BJP के लिए वह कर दिखाया, जो उत्तराखंड के इतिहास में कभी नहीं हुआ था।
उनका खटीमा में चुनाव हारना महज संयोग या फिर उनकी खुद की लापरवाही नहीं थी। खुद को खुद मुख्तार मानने और PSD को अचानक अपने सियासी जिंदगी के लिए खतरा मानने वालों ने साजिशें रच के इस कृत्य को अंजाम दिया था। मोदी-शाह ये अच्छे से जान चुके थे। पुष्कर को वह इसी लिए फिर से तख्त पर बिठाने में पल भर के लिए भी नहीं हिचके थे। खुद मुख्तारों की अकड़-कस बल को झटके में निकाल दिया गया था। पुष्कर के विरोधी (बाहर से अधिक भीतर के) चालें चलते रहे हैं। जो Social Media तक ही सिमट के रहती रही हैं। मोदी-शाह को बेहद परिपक्व और चतुर राजनीतिज्ञ माना जाता है। दोनों के पास हर राज्य और वहाँ की आंतरिक सियासत की PhD थीसिस हैं। उनके करीब जल्दी पहुँचना और फिर नकारात्मक बातें करना-चुगली-शिकायत करना खुद की शामत बुलाने से इतर नहीं। दोनों किसी को भी बोलने का उतना ही मौका देते हैं, जितना वे खुद चाहते हैं। सुनना या फिर जानना। एक बार साफ है। मुख्यमंत्री की बुराई या आलोचना करने का मतलब मोदी-शाह के फैसले का परोक्ष विरोध है। ऐसा करना सियासी हाराकिरी से कहीं कम नहीं। यही PSD की सबसे बड़ी ताकत है।
Social Media या अखबारों में बयान देने की नौबत तभी आती है जब ऊपर सुनवाई न तो हो रही हो न ही कभी एकाध छोटा मौका मिले तो भी उस पर कोई उम्मीद बंधाने वाला कदम उठता दिखे। BJP आला कमान और मोदी-शाह भी जानते हैं कि उत्तराखंड में कौन उनके वफादार और काबिल हैं। सरकार में लाने की Hat Trick लगाने का दम कौन रखता है। पुष्कर उनके Selected फिर Tested CM हैं। हर बार प्रयोग सही साबित नहीं होते हैं। नाहक और फिजूल परीक्षण-प्रयोग घातक भी हो सकते हैं। PM-HM की जोड़ी से अधिक बेहतर ढंग से इसको कोई समझ नहीं सकता है। सरकार चलाते हुए 95 फीसदी चुनाव जीतना आसान नहीं होता है। पुष्कर ने ये कर दिखाया है। लोकसभा चुनाव में भी सभी 5 सीटों पर कमल खिला। साल-2009 में भी BJP की सरकार थी। BC खंडूड़ी CM हुआ करते थे। पार्टी राज्य की पांचों सीट हार गई थी। खंडूड़ी हटा दिए गए थे।
इस वक्त BJP के लिए अगर सबसे बड़े जरूरत है तो मंत्रिमंडल के कुछ चेहरों की छंटनी और कुछ ताजे-युवा और परिपक्व किस्म के स्फूर्तिवान-अविवादी और पुष्कर के भरोसेमंद लोगों को मंत्री बनाने की। इससे सरकार के कामकाज में तेजी आएगी। मंत्रियों को ले के नाराजगी दूर होगी। कुछ मंत्री उबाऊ-बासी और बेहद अलोकप्रिय हो चुके हैं। उन पर तमाम किस्म के विवादों का ठप्पा लग चुका है। आलम ये है कि मुख्यमंत्री की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा उनको बचाने-उनके चलते पैदा हालातों को दुरुस्त करने में लग रहा। कुछ मंत्री ऐसे हैं जो अंदरखाने पार्टी के ही चंद अति महत्वाकांक्षियों के साथ लगातार सियासी पासे फेंकने में मशगूल हैं। ये बात दीगर है कि हर बार उनका पासा गलत पड़ रहा। पुष्कर का एक ही पासा उन पर भारी पड़ रहा है।
कुछ मंत्रियों और उनके रहनुमाओं की गलत फहमी हालांकि बार-बार आला कमान से जुड़े चेहरे सीधे और साफ दूर करते रहे हैं। इसके बावजूद वे अपने चेलों और खिदमतगारों को नेतृत्व परिवर्तन की उम्मीदों में भरमाए रखने की नाकाम कोशिशों में जुटे रहते हैं। मोदी-शाह-पुष्कर की तिकड़ी के बिना उनके लिए अपना चुनाव जीतना आज की तारीख में ना-मुमकिन कह सकते हैं। शीर्ष नेतृत्व भी आपसी बातचीत या फिर आंतरिक बैठकों में ये कहने से चूकता नहीं है कि को भी मंत्री-विधायक या फिर MP खुद के बारे में गलतफहमी न पालें। वे अपने दम पर चुनाव जीत के नहीं आए हैं। मोदी-शाह के नाम और पुष्कर के मेहनत की बहुत बड़ी भूमिका उनको छोटे-बड़े सदन तक पहुंचाने में रही है। CM के तौर पर पुष्कर ने खुद को अनुभवहीन होने के बावजूद बेहद परिपक्व और चतुर साबित किया है। वह घर के विरोधियों को भी लेश मात्र एहसास नहीं होने देते हैं कि उनके पास उनकी हर चाल-साजिश की रिपोर्ट है। वह बड़े ही सुलझे ढंग से उनको Paintings की तरह दीवारों से चिपकाते जा रहे।
Congress के भी हर दिग्गज के साथ वह अनौपचारिक रिश्ते रख के उनको सिर्फ सियासी प्रतिद्वंद्विता तक सीमित रखने में सफल रहे हैं। इस मामले में वह Congress के दिग्गज रहे दिवंगत ND तिवारी की तरह हैं। जो विरोधियों और उनके दौर की BJP को मित्र विपक्षा बनाने में कामयाब रहे थे। उनके बारे में मशहूर था कि Congress के लोगों के काम हों न हों,BJP के किसी भी छोटे-बड़े नेता का काम उनके दरबार में अटकता नहीं था। BJP के बड़े नेताओं को सरकारी खजाने से इफ़रात में मोटी मदद करने से भी नहीं चूके थे। उन्होंने ही उत्तराखंड में ये भी सिखाया था कि विरोधी दल के लोग दुश्मन नहीं बल्कि प्रतिद्वंद्वी भर हैं। उनका ये गुर आज पुष्कर के काम भी आ रहा। देखा जाए तो वह इस मामले में NDT से आगे निकल चुके हैं। पुष्कर की सक्रियता क्षेत्रों का भ्रमण करने और लोगों से मिलने-जुलने के मामले में आज तक के हर मुख्यमंत्री के मुक़ाबले कोसों आगे है। छोटे और पहाड़ी राज्य में इसकी बहुत अहमियत होती है।
सरकार को ले के सिर्फ एक ही मुद्दा रहता था कि Field के कुछ Officers (DMs-SSPs) उम्मीदों के अनुरूप काम नहीं कर रहे। खास तौर पर पुलिस कप्तान। PSD ने दिवाली के बाद कप्तानों के फेरबदल में इसको तवज्जो दी है। विवादित और Field में खरे उतरने में चूके कप्तानों की जगह तेज-तर्रार और अधिक सुलझे चेहरों तवज्जो दी गई है। नैनीताल में मंजूनाथ TC-हरिद्वार से देहरादून लाए गए प्रमेन्द्र डोभाल और हरिद्वार भेजे गए नवनीत भुल्लर की ख्याति और काम करने की Style अलग किस्म की है। इनसे सरकार कानून-व्यवस्था में खास उम्मीद लगाए हुए है। तीनों ने नई सल्तनत संभालते ही नतीजे देने शुरू भी कर दिए हैं। उधम सिंह नगर में अजय गणपति नया चेहरा है। DMs में अधिकांश Postings पहले से अच्छी चल रही। रुद्रप्रयाग के प्रतीक जैन खुद ही DM की कुर्सी से हटना चाहते थे। उधम सिंह नगर के नितिन भदौरिया-हरिद्वार के मयूर दीक्षित-पौड़ी की स्वाति भदौरिया और उत्तरकाशी के प्रशांत आर्य को सुलझे हुए Collectors में शुमार किया जाता है।
इन सभी के काम करने का तरीका अवाम और सरकार के मुफीद है। नैनीताल के ललित मोहन रयाल और चंपावत के मनीष कुमार भी पहली बार Collector बनने के बावजूद परिपक्वता साबित कर रहे। देहरादून के सविन बंसल अपनी आक्रामक और लोकप्रिय अंदाज से छाए हुए हैं। ये बात अलग है कि Super Time Scale (सचिव या फिर Commissioner) में प्रोन्नत हुए सवा साल होने के करीब होने के चलते शायद CM पुष्कर उनकी जगह किसी और को लाने की सोच रहे हों। सविन का उत्तराधिकारी तलाशना आसान नहीं होगा। विधानसभा चुनाव का भी ध्यान रखना है। बहुत सुलझे और अनुभवी को DM की कुर्सी दी जा सकती है।



