
Chetan Gurung
उत्तराखंड की सियासत और खास तौर पर BJP में ही रह-रह के सुनामी लाने की कोशिशों का CM पुष्कर सिंह धामी हर बार PM नरेंद्र मोदी और HM अमित शाह के विश्वास की कटार से सफाया करते रहे हैं लेकिन एक बात साफ है। मंत्रियों को गद्दी पर बने रहना है या किसी MLA को बचे हुए एक साल के लिए मंत्री बनने का ख्वाब पूरा करना है या फिर अगले Assembly Elections में टिकट हासिल करना है तो फिर उनकी तकदीर के फाटक की चाबी PSD के हाथों में ही है। मोदी-शाह तक PSD के अलावा किसी भी कथित क्षत्रप की इतनी सीधी पहुँच नहीं नजर आती जो दोनों से साफ-साफ तो दूर, ईशारों में ही किसी की भी कुछ चुगली कर सके। उत्तराखंड से जुड़ा कोई भी फैसला देश के Number-1 और 2 ने अब तक बिना PSD की राय के न लिया है न लेंगे। ऐसा समझा जाता है। बार-बार उत्तराखंड में नेतृत्व परिवर्तन का शोर पार्टी के भीतर ही मौजूद महत्वाकांक्षी उड़ाते हैं लेकिन वे भी हकीकत से अच्छी तरह वाकिफ हैं। उनको ले के माना जाता है कि वे ऐसा कर के अपना मन अधिक बहला रहे और अपने समर्थकों को खुद के सत्ता के शिखर में आने का सब्ज बाग भर दिखा रहे।


CM पुष्कर सिंह धामी को PM Narendra Modi और HM Amit Shah के बेहद विश्वासपात्रों में शुमार किया जाता है
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इन दिनों मुख्यमंत्री से मिलने वालों की तादाद पर नजर डालें तो मालूम चलता है कि इनमें विधायक बड़ी तादाद में हैं। कुछ मंत्री भी मिल रहे लेकिन इसकी वजह उनकी सरकारी और आधिकारिक हो सकती है। कई गैर विधायक लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर दमखम रखने वाले चेहरों की भी मुख्यमंत्री से मुलाकातों का दौर बढ़ता नजर आया है। ऐसा तब हो रहा जब रह-रह के पार्टी के भीतर से ही कुछ स्थापित चेहरे हवा उड़ाते रहे हैं कि सरकार में कुछ भी हो सकता है। अब सियासी विश्लेषक तो दूर आम लोग भी इन बातों को गहराई या गंभीरता से नहीं लेते हैं। 5-6 दर्जन बार इस किस्म का हल्ला उड़ चुका है। इससे इस किस्म के हल्ले की भी गंभीरता और अहमियत माटी में मिल चुकी है।
एक अहम खबर छन-छन के आती रहती है। मोदी-शाह से Final अनुमोदन न मिल पाने के चलते मंत्रिमंडल विस्तार और कुछ मंत्रियों की संभावित छुट्टी का मामला अटका हुआ है। ऐसा BJP आला कमान में सूचनाओं के लिहाज से दखल रखने वाले दिल्ली के सूत्र बताते हैं। बदलाव हुए तो शायद 2 या 3 मंत्री तक मंत्रिमंडल से अलविदा किए जा सकते हैं। अलबत्ता, सभी खाली सीटों को भरा जाएगा या कुछ फिर भी खाली छोड़ी जा सकती है, इस पर मोदी-शाह के दौर में कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है। वे चौंकाने में अधिक यकीन रखते हैं। कई मुख्यमंत्रियों की ताजपोशी के बाद उन्होंने नितिन नबीन को BJP का अध्यक्ष बना के पूरे देश और दुनिया को हैरत में डाल दिया।
PSD के लिए ये और अच्छा है कि नितिन नबीन भी उनकी काबिलियत और दमखम से भली-भांति वाकिफ हैं। अगले विधानसभा चुनाव के रथ की रास पुष्कर के हाथों में थमाने के हक में वह भी कुर्सी पर बैठते ही समझे जाते हैं। यूं भी मोदी-शाह की पसंद अध्यक्ष की स्वाभाविक पसंद समझी जाती है। खास पहलू ये है कि पुष्कर को Congress या फिर से खुद को खड़ा करने की कोशिश कर रही UKD से दिक्कत या चुनौती नहीं दिख रही। उनको सिर्फ घर के भीतर के विरोधियों को पस्त करना है। इसमें वह लगातार कामयाब होते रहे हैं।
समीक्षक मानते हैं कि बड़े-बड़े और अहम कानून (UCC-धर्मांतरण-Land Law Etc) लाने के साथ ही Paper Leak-अंकिता भण्डारी हत्याकांड सरीखे देवभूमि को उबालने वाले मुद्दों को Smart फैसलों और Move से अवाम को शांत-संतुष्ट करना किसी अन्य मुख्यमंत्री के वश में शायद ही होता। कठिन चुनौतियों से PSD हमेशा ही जूझते और पार पाते रहे हैं। पहली बार Covid-19 काल में बेहद प्रतिकूल हालात में मुख्यमंत्री बनने के साथ ही। उनकी ताकत हर सियासत के बाद और बढ़ी है। मोदी-शाह की नजरों में उनकी अहमियत में इजाफा होता गया है।
अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि मंत्रिमंडल विस्तार या फेरबदल हुआ तो आला कमान सिर्फ मुख्यमंत्री पुष्कर की सिफ़ारिशों को तवज्जो देगा। जिसकी रिपोर्ट मुख्यमंत्री की तरफ से सकारात्मक नहीं जाएगी, उसकी छुट्टी तय है। Cabinet Reshuffle के आसार को नकारा नहीं जा सकता है। सरकार के खिलाफ लहर कई बार महज मंत्री विशेष के खिलाफ होती है। खराब प्रतिष्ठा या छवि वाले मंत्रियों को हटा के BJP-मोदी-शाह ने कई राज्यों के विधानसभा चुनाव फतह किए हैं।
कौन विधायक मंत्री बनने लायक है। कौन विश्वासपात्र है और मंत्री बनाया जा सकता है, ये भी मुख्यमंत्री अपने हिसाब से तय कर सकते हैं। फिर चुनाव में किस मौजूदा विधायक या मंत्री का पत्ता-टिकट काटना है, और किसको उसकी जगह मैदाने चुनावी समर में उतारना है, इसमें भी PSD की भूमिका और राय बेहद अहम होगी। उनके पास इन दिनों कई स्थानीय स्तर पर वजन रखने वाले चेहरे बहुत अधिक मंडराने की वजह यही है।
एक खबर ये भी है कि कुछ मंत्री अपनी मौजूदा सीट के बजाए कहीं और से लड़ने को बेकरार हैं। उनके बाबत बताया जा रहा है कि वे इस कोशिश में हैं कि उनको नई और एकदम अजनबी लेकिन चुनावी तैयारी करने में आसान लगने वाली विधानसभा से लड़ने की हरी झंडी मिल जाए। अभी तक की अंदरूनी जानकारी के मुताबिक उनको इस मामले में निराशा मिल रही। आला कमान किसी भी मंत्री या विधायक को क्षेत्र बदल के चुनाव लड़ने की सुविधा देने के लिए राजी नहीं है। उसका मानना है कि सीट छोड़ के भागने से पार्टी और सरकार के हक में गलत संदेश जा सकता है।
मुख्यमंत्री खुद मंत्रियों के सीट बदलने के हक में नहीं बताए जाते हैं। CM पुष्कर के इर्द-गिर्द मंडराने और उनके करीबी बनने की कोशिश करने वालों के बाबत ये भी माना जा रहा है कि वे इस फेर में बेचैन हैं कि एक साल के लिए ही सही लेकिन कोई सरकारी दायित्व ले पाएँ। सूत्रों के मुताबिक काफी समय से दायित्वों की List बन के रखी हुई है। बस आला कमान के अंतिम इशारे का इंतजार मुख्यमंत्री को है। इशारा मिलते ही ये List बाहर आ जाएगी। देखना दिलचस्प होगा कि आखिरी साल के लिए किस-किसकी Lottery लगती है।



