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तकदीर के सिकंदर से सियासत का धुरंधर:अंकिता मामले में CBI जांच बड़ा कदम

The Corner View

Chetan Gurung

4 साल से ज्यादा का अरसा हुआ जब अचानक एक फोन कॉल आई। दूसरी तरफ से जानी-पहचानी एक आवाज थी। पुष्कर को मुख्यमंत्री चुन लिया गया है। वह शपथ ले रहे आज ही। देहरादून में BJP प्रदेश मुख्यालय पहुँच रहे। मुझे बहुत ताज्जुब नहीं हुआ। तब Covid-19 का दौर चल रहा था। BJP रसातल में जा चुकी थी। पार्टी के लोग और सियासी विशेषज्ञ इसको खुल के मान रहे थे। उत्तराखंड का सियासी Track Record के मुताबिक सरकार Congress की आनी थी। सियासी मौसम पूरी तरह इसके माकूल लग राहत था। BJP आला कमान परेशान था कि सरकार को कैसे बचाएं। किसके मजबूत कंधों पर भरोसा किया जाए। PM नरेंद्र मोदी और HM अमित शाह को तब उस नौजवान का चेहरा याद आया जो बेहद युवा और ऊर्जा-जोश से भरा था लेकिन सरकार चलाने के अनुभव के नाम पर शून्य था। काबिलियत लेकिन झलकती थी। युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके थे। सभी को साधने और संघ-संगठन के लोगों का भरोसा जीतने और 24 घंटे दौड़ने की क्षमता-हौसला रखता था। उसको आदेश मिला। देहरादून जाओ और सरकार संभालो। साथ में सौंपा गया BJP को फिर सरकार में लाने का ना-मुमकिन और अभूतपूर्व लक्ष्य। और फिर इतिहास गवाह है। उस नौजवान मुख्यमंत्री ने ये कर दिखाया। सिर्फ 7-8 महीने के दौर में। ये शख्स पुष्कर सिंह धामी था। जो महज दूसरी बार का विधायक था। खटीमा से। सरकार चलाने के नाम पर कभी एक File उसके दस्तखत से नहीं चली थी। वह अंकिता भण्डारी कांड में आरोपितों के जेल में उम्र कैद काटने के बावजूद CBI जांच की सिफ़ारिश कर एक बार फिर सुर्खियों में देश भर में छाए हुए हैं।

उसने लेकिन मोदी-शाह की उम्मीदों पर खरा उतरते हुए सियासी कमाल कर दिखाया। रात-दिन घूम-घूम के पार्टी के लिए अलख जगाई। अवाम में फिर भरोसा जगाया। कार्यकर्ताओं और ओहदेदारों में जोश भरा। हैरतनाक और ऐतिहासिक विजय पार्टी को दिलाई। यहीं से उसके दुश्मन बाहर से ज्यादा घर में पैदा हो गए। खटीमा में साल-2022 की उसकी शिकस्त संभव नहीं थी। घर के भेड़ियों-मीर जाफ़रों ने दगाबाजी न की होती तो। मोदी-शाह समझ गए थे। जिसकी मेहनत से उनके साए में कमल ने कमाल किया हो, वह यूं ही नहीं हार सकता। सरकार की कमान फिर से उसको सौंप दी गई। ये छिपा सत्य नहीं रह गया है कि आज पुष्कर देश के 2 सबसे शक्तिशाली चेहरों के सबसे भरोसेमंद और कसौटी पर खरे उतरे BJP सरकार के मुख्यमंत्री हैं। जिनके फैसलों को केंद्र और मोदी सरकार ने भी कई मर्तबा अनुकरणीय माना है। UCC-नकल कानून इनमें शामिल हैं।

Chetan Gurung

उत्तराखंड की बात करें तो Congress में उनके मित्र और शुभचिंतकों की कमी नहीं है। ये उनकी सियासी कुशलता और हुनर की श्रेष्ठ मिसाल है। Congress के दिग्गज मरहूम नारायणदत्त तिवारी को इस मामले में वह कड़ी टक्कर देते नजर आते हैं। हकीकत ये है कि उनको बर्दाश्त न कर सकने वालों की जमात उनकी ही पार्टी में अधिक समझी जाती है। ये वह लोग माने जाते हैं, जो मोदी के नाम-शाह के रणनीतिक कौशल व चातुर्य और पुष्कर की मेहनत के बूते सियासी कामयाबी-चुनावी जीत की रोटी खा पा रहे हैं। अब भले उनको खुद पर गुमान है या फिर उनकी महत्वाकांक्षा ज्यादा हिलोरे मारती रहती है। विधानसभा चुनाव के लिए अब जुम्मा-जुम्मा साल भर रह गया है। Congress के हाल को उत्तराखंड में आज भी बहुत अच्छी सूरत में नहीं देखा जा रहा। ऐसे में BJP में ही कई कथित बड़े नाम-चेहरे सियासी शकुनि-दुर्योधन और फिर से दगाबाज बनने के लिए बेताब समझे जाते हैं। आला कमान तक इसकी खबर न हो, संभव ही नहीं है।

वक्त आने पर शायद उनसे हिसाब पूछा जाएगा। पुष्कर को घेरने की लंबी कवायद बरकरार है। हर बार नया चक्रव्यूह विपक्ष और साथ ही घर के भीतर से भी तैयार किया जा रहा। अभिमन्यू की तरह पुष्कर को उसमें फँसाने की कोशिश बार-बार होती रही है। हर बार वह इसको तोड़ डाल रहे। कभी उनको खटीमा में बतौर मुख्यमंत्री पहले ही चुनाव में घेर के आगे का सियासी सफर खत्म करने की कोशिश की गई। कई बार सियासी अस्थिरता जैसा माहौल पैदा किया गया। खुद मुख्यमंत्री इस पर अब टिप्पणी भी करने से नहीं हिचकते कि कम से कम 55-60 बार उनको हटाये जाने का शोर मचाया जा चुका है। उनको इससे फर्क नहीं पड़ता। वह अपना काम कर रहे।

सियासी के साथ ही सरकार चलाने के हुनर के मामले में पुष्कर को पुराने नौकरशाह नंबर देने से नहीं हिचकते हैं। एक पूर्व नौकरशाह ने Whats app किया कि वह जो कदम उठा रहे और फैसले ले रहे, वह हर किसी के वश का नहीं है। वह सरकार का काम करने के साथ ही संघ और BJP के एजेंडे को पूरा करने में भी अव्वल दिखते हैं। मोदी-शाह को और क्या चाहिए! जितना ज़ोर पुष्कर के विरोधी उनको नुक्सान पहुँचाने में लगाएंगे, उतनी ताकत मोदी-शाह से पुष्कर को मिलती जाएगी। दोनों जानते हैं कि अति महत्वाकांक्षी लॉबी उनको लगातार कुर्सी पर देख बेचैन है।

मोदी और शाह सिर्फ ये देखते हैं कि अमुक शख्स उनके मानक पर खरा उतरता कि नहीं। उनके मानक तय हैं। PSD उसको बार-बार पास करते रहे हैं। नकल विरोधी कानून (प्रतियोगी परीक्षा), भू-कानून (उत्तराखंड का भावनात्मक मुद्दा), Land जिहाद (संघ का मुद्दा) और पेपर लीक-नकल (युवाओं से जुड़ा मुद्दा) की CBI जांच के उनके फैसले बहुत बड़े समझे जाते हैं। अब उत्तराखंड को हिला रहे अंकिता भण्डारी मामले में आरोपितों कों उम्र कैद के बावजूद CBI जांच कों मंजूरी देना, बड़ी बात मानी जा रही। UP के कुलदीप सेंगर मामले की CBI जांच के लिए सरकार राजी नहीं हुई। महिला दिग्गज पहलवानों के साथ यौन शोषण मुद्दे पर देश भर में बवाल के बावजूद कोई Action कुश्ती संघ के उस वक्त के प्रमुख के खिलाफ नहीं लिया गया। PSD तो सिल्क्यारा Tunnel मामले में धूनी रमा के, या फिर तम्बू गाड़ के, मौके पर ही जम गए थे। आखिरी शख्स को जीवित-सुरक्षित निकालने तक वह वहीं जमे रहे थे। धराली आपदा के दौरान भी वह वहीं पहुँच गए थे। लगभग हर बड़े मसले और आंदोलन की सूरत में वह भागने के बजाए आंदोलनकारियों के बीच पहुँचने से कतई नहीं कतराए।

किसी मुख्यमंत्री को ऐसा करते पहले कभी नहीं देखा गया। ये सब वह विपरीत सियासी हालातों में करते रहे हैं। ये विडम्बना है कि BJP में कथित बड़े चेहरे मुश्किल हालात में गायब और अपनी ढफली और ज़ोर से बजाते अधिक महसूस हुए हैं। मंत्रियों में एकाध को छोड़ बाकियों का यही आलम है। अंकिता भण्डारी मामले में Congress का फर्ज ही है कि वह सरकार को घेरे। वह कोई NGO नहीं है। राजनीति करना उसका जन्मसिद्ध अधिकार है। इसके उलट BJP और सरकार से जुड़े चेहरे गायब से नजर आ रहे। वे कर क्या रहे? कुछ तो सरकार और पार्टी के लिए अपने बयानों से और दिक्कत पैदा कर दे रहे। उनमें वह सियासी और वाक पटुता का हुनर ही नहीं दिख रहा, जो सरकार-पार्टी के लिए हालात बेहतर कर सके। अकेले CM पुष्कर को इस मोर्चे पर जूझते देखा जा रहा।

मुझे ये कहते कोई हिचक नहीं होती है कि पुष्कर बेहद सीमित मानव संसाधनों-सहयोग के बावजूद हर मोर्चे पर जोश के साथ अकेले भी डट रहे। उनके पास वांछित किस्म के नौकरशाह और सियासी चेहरे पर्याप्त तादाद में उपलब्ध नहीं हैं। सच ये है कि उत्तराखंड इस वक्त नौकरशाही (IAS-IPS-IFS) में पराभव और सबसे संकटग्रस्त दौर से गुजर रही है। गिनती के ही नौकरशाह ऐसे हैं, जो सरकार-अवाम की उम्मीदों को पूरा कर रहे। पहले अधिकांश नौकरशाह काबिलियत का डंका देश भर में बजाया करते थे। इस मामले में NDT सबसे अधिक खुशकिस्मत रहे थे। उनको अच्छे और काबिल नौकरशाहों ने सरकार चलाने और विकास योजनाओं कों तैयार करने और उनको अंजाम तक पहुंचाने में वाकई गज़ब का साथ दिया था। साथ ही तब नौकरशाह एक खूंटा पकड़ के चलते थे। वफादारी निभाते थे।

आज कई नौकरशाह ऐसे हैं, जो अलग-अलग नाव पर सवार हैं। उनके कई हस्तिनापुर हैं। कुछ वाकई काबिल हैं लेकिन व्यवहारिक नहीं। कुछ व्यवहारिक हैं तो उनकी छवि पर गहरे सवाल हैं। कुछ न व्यवहारिक हैं,न छवि अच्छी रखते हैं। उनकी काबिलियत को ले के भी उनकी ही जमात के लोग सवाल उठाते हैं। वे सरकार के लिए सिवाय सिर दर्द और घातक से अधिक कुछ नहीं। ऐसों से छुटकारा पाना होगा। CM के तौर पर पुष्कर के हालिया दो फैसले बहुत अहमतरीन समझे जा रहे। नकल (पेपर लीक) मामले की CBI जांच कराना और अब अंकिता भण्डारी मामले में CBI जांच का ऐलान। पेपर लीक मामले को निस्संदेह पुष्कर ने बहुत ही कुशलता और चातुर्य के साथ संभाला। अब अंकिता मामले में भी वह फूँक-फूँक के लोगों और अंकिता की माता-पिता से मिल के उनकी भावनाओं के अनुरूप सबसे बेहतर कदम उठाने की कोशिश करते दिख रहे। भले सियासी विरोधी इस पर अंगुली उठाएँ।

आरोपितों के Resort वनन्तरा को बुलडोज़ किए जाने को ले के जरूर सरकार पर सवाल उठाए जा रहे कि ऐसा सुबूतों को नष्ट करने के लिए किया गया। इसमें अगर उस वक्त की Media Reports और Social Media को तलाशा जाए तो मालूम चलेगा कि अनेक आवाजें तब ये भी उठी थीं कि योगी सरकार की तरह पुष्कर सरकार वनन्तरा पर बुलडोजर क्यों नहीं चला रही। उत्तराखंड बनने के बाद यहाँ की सरकारों और मुख्यमंत्रियों तथा नौकरशाही को बहुत ही करीब से देखा है। मुझे ऐसा लगता है कि BJP आला कमान को अब काबिल और पर्याप्त संख्या (अभी सीटें मंत्रिमंडल में खाली हैं) में मंत्री पुष्कर को उपलब्ध कराने चाहिए। नौकरशाही में पुनर्गठन करना बहुत जरूरी होगा। खास तौर पर शासन में और IPS-IFS Cadre में।

काबिल-अच्छी छवि वाले वफादार नौकरशाहों को तलाश के प्रोत्साहन देना होगा। सिर्फ मीठी जुबान वाले और कामकाज से दूर भागने वालों की मुश्कें कसने का दौर आ चुका है। जो अब तक नहीं सुधरे या बदले, उनसे अब उम्मीद करना निरर्थक और कुल्हाड़ी पर ही पैर जा मारना होगा। इसमें देरी-हिचक नहीं होनी चाहिए। मुख्यमंत्री जमीनी कार्यकर्ताओं और अवाम के हर शख्स के साथ ही नौकरशाहों को भी निश्चित रूप से बहुत बारीकी से जानते हैं। वह बस मौका पर्याप्त देना पसंद करते हैं। जल्दी-जल्दी फेरबदल उनकी फितरत नहीं लेकिन अब देरी का वक्त नहीं रह गया है। तकदीर के सिकंदर से अब सियासत के धुरंधर के तौर पर खुद को और सशक्त करने और अधिक मजबूती से स्थापित करने के लिए इससे बेहतर दौर या वक्त नहीं होगा।

खास तौर पर जब वे यह अच्छी तरह जानते हैं कि मोदी-शाह की छत्रछाया न होती तो उनकी कुर्सी पर ललचाई नजर गाड़ने वाले उनके कामकाज पर सूक्ष्मदर्शी लेंस लगाए और ये संदेश देने में कोई कोताही नहीं बरत रहे कि उनकी Hotline सीधे ऊपर जुड़ी है। पुष्कर को अब संदेश देना होगा। अपने-परायों-काबिल-नाकाबिलों को अलग-अलग कर कार्रवाई और फैसले लेने होंगे। विधानसभा चुनाव दूर नहीं हैं और आंतरिक विरोधियों की बेचैनी-बेकरारी में कोई कमी आने के बजाए उसमें इजाफा होता जा रहा। बेशक वे कुछ कर न पाने की कसक पाले हुए हैं। हर मौके पर उनके हिस्से अभी तक शिकस्त आई है।

 

 

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