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CM-सत्ता और काबिल-उच्छृंखल-शातिर नौकरशाह!

अपने बूते-हुनर के सहारे मोदी-शाह के साए में इतिहास लिखेंगे PSD!

The Corner View

Chetan Gurung

Silver Jubiliee मना रहे उत्तराखंड में मुख्यमंत्रियों को ले के कई बार चर्चा और ये सवाल भी उठते रहते हैं कि इन सब में कौन सबसे बढ़िया रहे? जाहिर है कि मौजूदा CM पुष्कर सिंह धामी की तुलना उनके पूर्ववर्तियों से करने की कोशिश विश्लेषक खूब करते हैं। इसमें गलत सरीखा कुछ नहीं है। सभी की निजी राय होती है। कुछ निजी अनुभव तो कुछ अखबार-पत्रिका पढ़ के,News Channels देख के या फिर लोगों के मुख से सुन के राय बनाते हैं। इन सबसे इतर एक तथ्य और है। जिसके बिना पर सरकार के सर्वश्रेष्ठ या अब तक के सबसे बेहतर मुखिया की राय बनाई जाती नजर आती है। वह है जाति और क्षेत्र। मतलब,ब्राह्मण या ठाकुर,गढ़वाली-कुमायूं वाले। इसके बिना पर राय कई बार बेहद कठोर और पुख्ता नजर आई है। खास तौर पर जाति वाला कोण। गढ़वाल से BC खंडूड़ी (एक ही कार्यकाल में 2 बार)-रमेश पोखरियाल निशंक-त्रिवेन्द्र सिंह रावत और तीरथ सिंह रावत ने सरकार की कमान संभाली। यूं तो नित्यानन्द स्वामी भी गढ़वाल मण्डल (देहरादून) से थे लेकिन उनको गढ़वाली नहीं माना जाता है। कुमायूं से CM बने Congress के हरीश रावत,BJP के भगत सिंह कोश्यारी और पुष्कर सिंह धामी को अपने क्षेत्र में कम से कम ऐसी चुनौती का सामना करना नहीं पड़ा या पड़ रहा।

PM नरेंद्र मोदी और HM अमित शाह के साए में चल रहे CM पुष्कर सिंह धामी पर नया इतिहास रचने का अहम जिम्मा!

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सियासी इतिहास गवाह है कि ठाकुर त्रिवेन्द्र और तीरथ को BJP में वह समर्थन पल भर के लिए भी नहीं मिला जो BCK और काफी हद तक RPN के पास था। स्वामी तो ब्राह्मण थे। अन्तरिम सरकार के और उत्तराखंड के पहले मुख्यमंत्री थे। उनके खिलाफ तो उनकी ही पार्टी में सारा जहां था। उनको मुझे दिए गए एक अखबारी (तब मैं अमर उजाला दैनिक में था) Interview के बहाने चलता कर दिया गया था। जो महज बहाना था। उनको हटाने के लिए। उनकी अगुवाई में उत्तराखंड राज्य का पहला विधानसभा चुनाव तक BJP ने नहीं होने दिया। उन पर हरियाणवी होने का दाग लगाया जाता रहा। नया-नया उत्तराखंड बना था। लोगों को बहुत अंदाज भी तंत्र का नहीं था। सभी लोग सीखने की प्रक्रिया में घुसे थे। हम पत्रकार भी। अवाम को तो बहुत ही कम मालूम था। राज्य बना तो लोग और आंदोलनकारी ही सवाल उठाने लगे थे। राज्यपाल बाहरी सिख (मरहूम सुरजीत सिंह बरनाला), मुख्यमंत्री हरियाणा (स्वामी की पृष्ठभूमि हरियाणा की थी) से,Chief Secretary राजस्थान (अजय विक्रम सिंह) के, DGP बिहार (अशोककान्त शरण) के,HC के Chief Justice बाहर से। नाम याद नहीं उनका।

Chetan Gurung

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सुन के लगता था कि वाकई बात में दम है। ये बहुत कम लोग जानते थे कि राज्यपाल बाहर से होना आम बात है। CJHC बाहरी ही होते हैं। आम तौर पर। CS-DGP Seniority के आधार पर बनते हैं। रही बात स्वामी की। वह मुझे एक दिन अपना दर्द बयां कर गए। वह बोले,`जिंदगी देहरादून में गुजार दी। इसी पल्टन बाजार में 30-40 साल पहले आंदोलन करते हुए पुलिस की लाठियाँ खाई। आज मुझे बाहरी बताया जाता है। मैं ठेठ उत्तराखंडी हूँ। जन्मजात देहरादून से हूँ’। स्वामी अविभाजित और उत्तराखंड बनने के दौरान UP में विधान परिषद के पहले उप सभापति फिर सभापति रहे थे। BCK और वह मुख्यमंत्री बनने के सबसे बड़े दावेदार समझे जाते थे। बाकी चेहरों में तब भगत सिंह कोश्यारी-निशंक-केदार सिंह फोनिया प्रमुख रूप से शुमार हुआ करते थे।

सब आपस में लड़-कट गए। मुख्यमंत्री बनने के लिए। स्वामी को तख्त से उतार के छोड़ा। BSK उनकी जगह आए। उनके खिलाफ भी क्रांति के बीज तुरंत पार्टी में पड़ गए थे। इस फेर में अति महत्वाकांक्षियों ने BJP और सरकार की लुटिया डुबो दी। गिरती-पड़ती चुनाव में उतरी Congress ने पहले ही General Elections (Assembly-2002) में कमजोर नेतृत्व के बावजूद उसको पटखनी दे दी। अध्यक्ष थे हरीश रावत। जो खुद मानते थे कि पहला चुनाव तो BJP ही जीतेगी। आखिर उसने (तब अटल बिहारी वाजपाई की सरकार केंद्र में थी) उत्तराखंड राज्य दिया है। उनकी तकदीर में लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं थी। सरकार में आई तो Congress ने उनकी जगह ND तिवारी को मुख्यमंत्री बना के पैराशूट से देहरादून Land करा दिया। वह UP में 3 बार CM और केंद्र में वित्त-वाणिज्य सरीखे अहम मंत्रालय संभालने का हाथी कद और वजन रखते थे। इसका लाभ उन्होंने उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनने के बाद राज्य के विकास में उठाया।

बेशक NDT के वक्त बहुत विकास कार्य हुए। SIDCUL (आज SIIDCUL) की उधम सिंह नगर-हरिद्वार-देहरादून में स्थापना हुई। इसी के बूते आज राज्य के लाखों लोगों को रोजगार और सरकार को Tax मिल रहा है। उत्तराखंड का Plan Size योजना आयोग (आज के NITI आयोग) में जा के धड़ाधड़ बढ़वाने में सफल रहे। NDT दूरदर्शी थे लेकिन सबसे अहम पहलू उनके कार्यकाल का ये रहा कि उनके पास काबिल नौकरशाहों (IAS-IPS-IFS-PCS-PPS) और Finance के अफसरों की लंबी-चौड़ी और बेहद अनुभवी फौज थी। भारत सरकार भी उनका डंका मानती थी। अजय विक्रम 6 महीने CS रहने के बाद रक्षा सचिव बने। उनके बाद CS बने मधुकर गुप्ता केंद्र में गृह सचिव बने।

डॉ रघुनंदन सिंह टोलिया को भी CS रहते भारत सरकार में सचिव बुला लिया था। वह जाने के बजाए उत्तराखंड के पहले मुख्य सूचना आयुक्त बन गए। आयोग को खड़ा और स्थापित किया। उनके उत्तराधिकारी M रामचंद्रन को केंद्र में शहरी विकास सचिव बनाया गया। उनकी तकदीर थोड़ी खराब रही कि दिल्ली Commonwealth Games उनके कार्यकाल में ही हुए। फिर उसमें घोटाले का शोर खूब मचा। केंद्र के मंत्री सुरेश कलमाड़ी और खेल Federation से जुड़े लोग जेल गए। बाद में कुछ नहीं निकला। सभी सींखचों से बाहर निकल आए। रामचंद्रन ने CS की कुर्सी सुरजीत किशोर दास को सौंपी। जो बेहद ज़हीन और मानवतावादी थे। फिर उनके बाद इन्दु कुमार पांडे-नृप सिंह नपल्च्याल-सुभाष कुमार-आलोक कुमार जैन मुख्य सचिव बने। सभी एक से बढ़ के एक। सुभाष कामकाज में भी तेज और संवेदनशील थे। इन्दु-NSN पहाड़ की सरलता और सहजता लिए हुए थे।

आलोक जैन कड़े नौकरशाह थे। मुख्यमंत्री की जी-हुज़ूरी में व्यस्त रहने के बजाए सरकार-राज्य के हित को तरजीह देना पसंद करते थे। इससे उनको आलोकप्रियता भी झेलनी पड़ी। हर Payment वह Cheque से करते थे। Credit Card और Dabit Card की संस्कृति से दूर थे। एक बार वह सर्दियों की देर शाम दफ्तर (CS OFFICE) से उतर रहे थे। बोले कि आज Bank से पैसा निकालना भूल गया। मैंने यूं ही कहा कि घर में तो होगा कुछ पैसा। उन्होंने के चर्चित नौकरशाह का नाम ले के चुहल करते हुए कहा कि मैं वह थोड़ी हूँ जो बिस्तर के नीचे नोटों की गड्डियाँ रख के सोए। उनके बाद फिर कई CS आए। पहले तो सुभाष दुबारा कुर्सीनशीन हुए। CM विजय बहुगुणा उनको फिर ले आए। फिर N रविशंकर-राकेश शर्मा CS-शत्रुघ्न सिंह बने। फिर बाद में कई आए और बिना छाप छोड़े चले गए।

जो CS नहीं बन सके लेकिन बेहद काबिल IAS अफसर थे, उनका भी जिक्र करना उचित रहेगा। OP आर्य-विजेंद्र पाल,S कृष्णन-केशव देसीराजू, विनीता कुमार, PC शर्मा, दिलीप कोटिया,अमरेन्द्र सिन्हा कहीं से कम नहीं थे। ND तिवारी और उनके बाद BCK-निशंक को ऐसे बेहद अनुभवी नौकरशाहों का साथ मिला। ये वह दौर था जब PCS अफसर भी बेहद दमदार और सुयोग्य हुआ करते थे। अधिकांश बेदाग छवि और प्रतिष्ठा रखते थे। उस वक्त के PCS अफसरों में अनिल शर्मा-सोहनलाल,सुरेन्द्र सिंह रावत,भास्करानन्द जोशी-मंजुल जोशी-विनोद शर्मा हुआ करते थे। अनिल शर्मा-सोहनलाल को छोड़ बाकी सभी IAS और सचिव बन के Retire हुए। शर्मा की उम्र हो गई थी और सोहनलाल ने IAS बनने के लालच पर अपनी पेंशन का नुकसान बचाने पर ध्यान दिया।

CS में कईयों को मैंने बेहद करीब से देखा-समझा। सिवाय AVS के। वह जल्दी ही केंद्र चले गए। मधुकर बेहद परिपक्व और ज्ञानी थे। RST ज्ञानी के साथ थोड़ी जुबान से कड़वे लेकिन असल माटी पुत्र थे। रामचंद्रन बेहद व्यावहारिक। सुरजीत और सुभाष के दरबार से शायद ही कोई ना-उम्मीद और निराश लौटते थे। सुभाष बेहद अपनत्व भरे अंदाज में खूब बातें कर के जहां भर की जानकरियाँ जुटा लेते थे। SKD मितभाषी थे। आलोक जैन System को सुधारने में जुटे रहे। राकेश हरफनमौला थे। उनके पास CS का कार्यकाल सिर्फ 3 महीने रहा। वह उससे पहले ही अपने तूफानी कार्यशैली से छाए रहे। उनको हुनर आता था कि कैसे सियासी आकाओं को संतुष्ट रखा जाता है।

आज के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी साल-2012 में पहली बार खटीमा से MLA बने थे। तब सरकार Congress की थी। इसके बावजूद वह PSD के प्रस्तावों पर खटीमा के विकास संबंधी और अन्य कार्यों को करने में कमी नहीं रखते थे। उस वक्त वह प्रमुख सचिव थे और वित्त-खनन-भारी उद्योग-नागरिक उड्डयन का जिम्मा संभाल रहे थे। मुझे याद है कि कुछ Congress वाले ऐतराज जताया करते थे कि सरकार हमारी है। फिर BJP विधायक के कार्य कैसे हो रहे। राकेश शर्मा उनको समझाना और शांत खुश करना बाखूबी जानते थे। आज खुद उनका बेटा चैतन्य शर्मा HIMACHAL BJP में है। एक बार MLA बन चुका है। इतनी लंबी रामायण सरीखी कथा लिखने का आशय ये है कि नौकरशाहों की सरकार चलाने में अहम भूमिका रहती है। मैंने खुद देखा है जब सचिव स्तर के अफसर खुद ही अधिकांश मसले इस खूबी से निबटा देते थे कि मंत्री और मुख्यमंत्री को भनक तक नहीं होती थी।

बड़े से बड़े फैसले सचिव-प्रमुख सचिव खुद ले लेते थे या फिर उनमें ये गुर था कि मंत्री-मुख्यमंत्री को सहमत कर सकें। अमूमन ऐसा हो जाता था। आपसी प्रतिद्वंद्विता उनमें भी हुआ करती थी। जो झलकती भी थी। आज भी नौकरी कर रहे 3 IAS अफसरों में कभी खुल के टकराव अलग-अलग मामले में हो चुका है। खुले आम बैठक में वरिष्ठ नौकरशाहों में अपशब्दों-अशोभनीय बोलियों की बौछार मैंने खुद देखी है। गले तक एक-दूसरे के हाथ जाते देखे हैं। टोलिया-रामचंद्रन में कभी नहीं बनी। एक-दूसरे को देखना तक नागवार गुजरता था उनको। रामचंद्रन की फिर अपने उत्तराधिकारी सुरजीत किशोर दास और आलोक जैन से भी बिल्कुल नहीं पटी। जैन तब प्रमुख सचिव थे। सुरजीत FRDC और प्रमुख सचिव। रामचंद्रन ने एक बार उनसे कूटनीति कर Forest Department हटवा दिया था। उन पर ये लांछन भी लगा कि वह अपने बाद उनको CS नहीं बनने देना चाहते हैं।

विजेंद्र पाल की कई Senior-Junior-समकक्षों से नहीं पटी। इतना जरूर है कि उनकी योग्यता को देखते हुए CM BCK ने उनको श्रीनगर Medical College की स्थापना समेत कई बड़े कामकाज सौंपे। उन्होंने उनको सफलता पूर्वक निभाता दिया। IAS Week में कई बार समकक्ष या फिर Junior अफसर छोटे-छोटे नाटकों के जरिये अपने मन की बात निकाल लेते थे। जो बात वे खुल के कभी नहीं कह पाते थे, उनको इस सप्ताह, जो कि काफी खुलेपन को लिए होता है, में कह डालते थे। वे मुख्य सचिव या Power Centre को भी व्यंग्य के शिकंजे में लेने से नहीं चूकते थे। ऐसा इस बार के IAS Week में लंबे समय बाद हुआ। कुछ दिन पहले खत्म हुए प्रशासनिक अधिकारी सम्मेलन (वही IAS Week) में 2 बहुचर्चित अपने Cadre के अफसरों का शकुनि और You Tubera बोल के लघु नाटक में घुमा-फिरा के जिक्र कर दिया गया। IAS Association के अध्यक्ष 1997 Batch वाले L फैनई हैं। शायद Direction प्रमुख सचिव और 2001 Batch वाले R मीनाक्षी सुंदरम का था। इसका कोई असर Seniors के मनोभावों और बर्तावों पर पड़ेगा या नहीं कहा नहीं जा सकता।

गुजरे दौर के नौकरशाहों का जलवा बताऊँ। आज जो रईस और रसूख के साथ लग्जरी Motor में ठसके के साथ नामी-गिरामी बने फिरते हैं। IAS-IPS-मंत्रियों-MLAs को जेब में रख के घूमने का दावा करते हैं, उनकी तब नौकरशाहों के आगे मेमने से ज्यादा हैसियत और औकात नहीं दिखती थी। पाल-जैन-राकेश शर्मा से ले के भास्कर के छोटे से दफ्तर के बाहर खड़े ऐसे लोगों की हिम्मत बिना मंजूरी भीतर घुसने की नहीं होती थी। मंत्री और MLAs भी सचिवालय में आने और सचिवों-प्रमुख सचिवों-CS के आगे गुजारिश करते देखे जा सकते थे। एक बार एक PCS अफसर ने आज के एक बहुत बड़े और सियासत में भी दखल रखने वाले को फोन पर इतना भर बोला था कि तुम क्या थे और क्या हो, UP के जमाने से देहरादून Posting के दौर से जानता हूँ। आज के बाहर से आए IAS अफसरों या राजनेताओं की तरह समझने की भूल न करना।

गज़ब नहीं लगता मुझे कि वह बंदा 20 मिनट के भीतर उस अफसर के छोटे से दड़बेनुमा दफ्तर में चिरौरी करने पहुँच गया था। आज उल्टा है। ऐसों के आए नौकरशाह चिरौरी करते दिख जाते हैं। सरकार और तंत्र को दुरुस्त तथा मुख्यमंत्री को तनावमुक्त सिर्फ अपनी राजनीति में व्यस्त रहने देने का सारा बंदोबस्त किसी वक्त नौकरशाह रखते थे। NDT को आज अगर उत्तराखंड के विकास पुरुष का ताज दिया जाता है तो उनके पास उपलब्ध नौकरशाहों की लाजवाब फौज इसकी बड़ी वजह थी। NDT देहरादून तो दूर, अपने CM House (Old Circuit House,जो आज नया CM आवास है) से भी यदा-कदा ही बाहर निकलते थे। सुबह देर से-आराम से उठते थे और फिर आधी रात तक मिलना-जुलना-काम करना होता था। BCK-विजय बहुगुणा भी दौरों से अमूमन बचते थे। निशंक और हरीश इस मामले में कुछ अधिक सक्रिय दिखे। त्रिवेन्द्र भी बहुत दौरों से बचते थे।

आज के CM पुष्कर के मुक़ाबले उनके पूर्ववर्तियों ने एक किस्म से ऐशों-आराम की जिंदगी को जिया। PSD के पास न पूर्वर्तियों को मिले नौकरशाहों का दसवां हिस्सा है न ही मंत्रिमंडल-MPs-MLAs। आज के कई नौकरशाह ऐसे हैं, जो CM के प्रति वफादार का दिखावा भर करते हैं। हकीकत ये है कि वे हर नाव पर पाँव रखे हुए हैं। वे अपना फायदा अधिक देख रहे-मुख्यमंत्री के विश्वास से खेलते अधिक दिखते हैं। अपनी जिम्मेदारियों को सिर्फ अपने हित और भविष्य को भी देख के चल रहे। खुद की इच्छा हो तो चुटकी बजाते काम कर लेंगे लेकिन न हो तो किसी की भी नहीं सुनेंगे। कोई भी बोले। नौकरशाही को करीब से देखा है और देखता-समझने की कोशिश करता रहता हूँ। उनके कांड-कारनामे भी मालूम चलते रहते हैं। ऐसे नौकरशाह सरकार और किसी भी मुख्यमंत्री के लिए घाटे का सौदा होते हैं। BCK तो सिर्फ एक नौकरशाह के चलते सियासी भंवर में डूब के कश्ती से उतार दिए गए थे। नौकरशाहों की परख होना जरूरी होता है।

CM पुष्कर को पहले के मुख्यमंत्रियों सरीखा माहौल और मदद नहीं मिली है। उनको हर मोर्चे पर खुद दौड़ना होता है। वह बेहद परिपक्व और हालात समझने वाले हैं। उनको अलस्सुबह उठ के सैर पर आम लोगों से रास्ते पर मिलते-बतियाते-चाय पीते खूब देखा जाता है। अवाम से मुताल्लिक होने के लिए हर छोटे-बड़े आयोजन में पहुँचने की कोशिश करते हैं। नगर निगम-जिला पंचायत से ले के By-Elections (MP-MLA) तक में खुद को झोंके रखते हैं। अपने राज्य से बाहर के चुनावों में भी जी-जान लगाए रहते हैं। आला कमान और PM नरेंद्र मोदी-HM अमित शाह किसी को अपना Blue Eyed Man यूं ही नहीं बनाते हैं। उन्होंने कुछ देख के ही PSD को सीधे CM फिर दुबारा भी CM बनाए रखा है। मोदी-शाह के साए और आशीर्वाद के आगे किसी विरोधी की कोई बिसात नहीं कि वे पुष्कर का बाल भी बांका कर पाए। BJP-संघ के एजेंडे को PSD पहले ही भाँप के लागू कर रहे। प्रशासनिक सुधारों पर भी पूरा ध्यान रख रहे। धर्मांतरण-Land जिहाद-UCC कानून से संघ को खुश कर रहे तो नकल विरोधी कानून-भूमि कानून को बेहतरीन प्रशासनिक सुधार माना जा रहा। Slip of Tongue मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों का मज़ाक उड़वाते रहे हैं। पुष्कर को बेहद सोच-समझ के बोलने वालों में शुमार किया जाता है। एक मंत्री तो सिर्फ अपने बयानों से ही हंसी और मज़ाक बनते रहते हैं।

इतना तय है कि अगला Assembly Election पुष्कर की ही अगुवाई में BJP लड़ेगी। तब तक हो सके तो शासन स्तर पर शायद कुछ फेरबदल वह करें। ऐसा इसलिए कह रहा हूँ कि मुख्यमंत्री के तौर पर पुष्कर के पास हर किस्म की खबर हर शख्स की रहती है। वह राजनीतिज्ञ हो या फिर कोई छोटा-बड़ा अफसर। जिस पर भरोसा करते हैं, खूब करते हैं। पुराने रिश्तों को निभाना भी जानते हैं। ये बड़ी खूबी है कि अधिकांश DMs की छवि बहुत अच्छी है। ऐसा पहली बार है कि जिलों में बेहतरीन छवि वाले DMs इतनी अधिक तादाद में हैं। देहरादून के सविन बंसल-हरिद्वार के मयूर दीक्षित-उधम सिंह नगर के नितिन भदौरिया-पौड़ी की स्वाति भदौरिया-उत्तरकाशी के प्रशांत आर्य-रुद्रप्रयाग के प्रतीक जैन-नैनीताल के ललित मोहन रयाल सिर्फ कुर्सी पर ही नहीं हैं, अच्छी प्रतिष्ठा बनाए हुए हैं। सरकार की छवि को बनाने और बिगाड़ने में DMs-Collectors की बहुत अहम भूमिका रहती है। शासन में बैठे आला अफसरों से ज्यादा।

नौकरशाहों को भरपूर कार्यकाल देने के मामले में भी पूर्व के CMs पर PSD बहुत भारी साबित होते हैं। इतने लंबे कार्यकाल पहले DMs-SSPs-Commissioners-IGs (Zone) को नहीं मिला करते थे। आज के नौकरशाह खुशकिस्मत हैं। पहले ऐसे भी मामले रहे हैं जब DM-SSP चंद महीनों में ही हटा दिए जाते थे। चुगली या शिकायत पर भी। आज के दौर में जिलाधिकारियों-पुलिस कप्तानों को कम से कम चुगली या शिकायत कर के हटाना बहुत ही मुश्किल है। PSD की अपनी Intelligence है। वह उसी पर यकीन रख के कदम उठाते हैं। साथ ही अफसरों को सुधरने और काम कर कौशल दिखाने का पूरा मौका देते हैं। वह क्या आपस में लड़-भिड़ रही Congress को एक बार फिर उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में पटखनी देंगे? क्या फिर BJP की सरकार ला के CM बनने की Hat Trick लगाएंगे? लगातार दूसरी बार BJP को सरकार में लाने के बाद क्या एक और इतिहास लिखेंगे! सवा साल का इंतजार जवाब ले के आ जाएगा। इतना जरूर है कि पार्टी में मौजूद उनके अति महत्वाकांक्षी सहयोगियों को फिलहाल लंबा इंतजार करना पड़ेगा।

 

 

 

 

 

 

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