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40 डाकुओं से अनजान बहन के लिए Train में खुखरी ले के भिड़ने-उनको काट डालने वाले बिष्णु श्रेष्ठ की समाज-देश को दरकार

The Corner View

Chetan Gurung

पत्रकारिता के लंबे दौर में तमाम बड़े और प्रसिद्ध लोग, बड़े Brand बन गए चेहरों से मिला हूँ। आज के PM नरेंद्र मोदी (जब मिला तब वह संगठन देख रहे थे), दिवंगत PM अटल बिहारी वाजपाई-लालकृष्ण आडवाणी-दिवंगत राजीव गांधी-राहुल गांधी-पूर्व Cricketer सुनील गावस्कर-कपिलदेव-हिन्दी फिल्मों के Super Star अमिताभ बच्चन-विनोद खन्ना-जुबिली कुमार दिवंगत राजेन्द्र कुमार-निर्वासित तिब्बत सरकार के मुखिया दलाई लामा-Hollywood Star रिचर्ड गेर-श्रीदेवी-हेमा मालिनी-भारतीय चुनाव सुधार के इतिहास पुरुष TN शेषन-बांग्लादेश के 2 टुकड़े करने के उस वक्त के PM दिवंगत इन्दिरा गांधी की सोच को हकीकत में बदलने वाले Filed Marshal SHFJ मानेकशॉ और Victoria Cross विजेता गजे घले (दिवंगत) के साथ ही तमाम और भी कई बड़े नामों से मिला हूँ। मानेकशॉ मेरे बचपन के नायक थे। उत्तराखंड आंदोलन में शिरकत करने वाले और अल्मोड़ा के Cantt Board Member रहे गजे घले के बारे में भी खूब सुनते थे। ये इतने बड़े नाम थे और हैं कि उनसे मिलना वाकई बड़ी उपलब्धि है। मुझे बेहद खुशी हुई कि मैं उनसे मिल सका। इससे इतर कुछ कहना चाहूँगा। यकीन मानिए मुझे इनसे भी अधिक खुशी Indian Army से समय पूर्व Retirement लेने वाले नायब सूबेदार बिष्णु श्रेष्ठ से मिल के हुई। उनके खाते में मौजूद सेना मेडल और उत्तम जीवन रक्षा पदक उनकी बहादुरी-जांबाजी की कहानी बयां करने के लिए काफी है।

उनसे मिलने की खुशी इसलिए सबसे अधिक नहीं कि वह बेहद हिम्मतवर हैं और Train में एक अनजान बंगाली युवती की आबरू लूट रहे डाकुओं को अपनी घातक सिरुपाती खुखरी से गाजर-मूली की तरह काट डाला था। ये परवाह नहीं की कि खुद उनकी जान जा सकती है। आखिर Train में 40 के करीब डाकू घुस आए थे। उनके पास चाकू-कुल्हाड़ी-पिस्तौल और अन्य हथियार थे। ये करीब-करीब आधी Company थी। ये याद रखना होगा कि पूरी Train में एक भी शख्स ने डाकुओं को रोकने की कोशिश तक करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। खुद उस युवती के माता-पिता भी बेटी की अस्मत से खिलवाड़ कर रहे डाकुओं का प्रतिरोध कर नहीं पाए थे। रेल में मौजूद रहने वाली RPF (Force) का इस दौरान कहीं अता-पता नहीं था। बिष्णु की बहादुरी की कद्र इसलिए बढ़ जाती है कि उन्होंने ये सीख और प्रेरणा दी कि अगर कोई मदद मांगे तो पीछे हटने का कोई मतलब या विकल्प नहीं। नारी, अबला,निरीह के लिए खुद की जिंदगी दांव पर लगा दो। भले मदद मांगने वाला या वाली कोई भी हो। बिष्णु अपने पत्नी के साथ मेरे आग्रह पर मिलने मेरे घर आए।

Chetan Gurung

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बिष्णु भारतीय सेना से VRS लेने के बाद अब नेपाल के गण्डकी अंचल (राज्य) के कास्की जिले के खूबसूरत तथा साल भर हिमाच्छादित रहने वाले अन्नपूर्णा-माछापुच्छर पर्वत शिखरों की गोद में बसे पोखरा घाटी में रहते हैं। मूल रूप से पर्बत जिले के रहने वाले हैं। उन पर फिल्म बन चुकी है। राघव जुयाल अभिनीत फिल्म `Kill’ उनकी बहादुरी और साहस पर आधारित है। उन पर एक बायोपिक भी आ रही। उनकी जिंदगी पर कहानी के अधिकार हिमेश रेशमिया ने खरीद लिए हैं। बिष्णु को समझने के लिए साल-2010 के सितंबर की घटना के बारे में जानना जरूरी है। वह मौर्य एक्स्प्रेस से नेपाल अपने घर जा रहे थे। रांची से गोरखपुर जाते वक्त आसनसोल के जंगल में Train को डाकुओं ने रोक दिया। फिर शुरू हुआ लूटपाट का दौर।

सशस्त्र डाकुओं ने जब लूटपाट शुरू की तब बिष्णु नींद में थे। एक डाकू ने उन पर हाथ छोड़ दिया और सब कुछ उसको सौंपने के लिए धमकाया। वह ज्यादा जिद करने लगा तो बिष्णु ने पहले तो उसको समझाया कि उसके पास सिवाय ATM Card के कुछ नहीं है। ये भी बताया कि वह फौजी है और गोरखा रेजीमेंट से है। डाकू लूटने पर आमादा हुआ तो बिष्णु ने उसकी पिटाई कर दी। वह डाकू इस पर अपने साथियों को बुलाने या किसी और कारण से चला गया। बिष्णु को एहसास हो गया कि वह जरूर लौटेगा और हमला करेगा। उसने किसी भी हालात का सामना करने के लिए अपनी सिरुपाती खुखरी चुपके से बैग से निकाल के अपने पास छिपा के रख ली। उसी समय कई और डाकू उसी जगह आ गए, जहां वह बैठे हुए थे। सामने एक बंगाली परिवार 18 साल की बेटी के साथ बैठा हुआ था। डाकुओं की नीयत उस युवती को देख के डोल उठी। वे उसके साथ ज़ोर-जबर्दस्ती कर उसकी आबरू से खेलने लगे। युवती मदद के लिए चिल्लाने लगी।

बिष्णु पहले खामोश रहे। फिर वह लड़की चिल्लाई कि मुझे बचा लो। डाकू उसको निर्वस्त्र कर रहे थे। तभी वह लड़की दुबारा बिष्णु से मुखातिब हो के मदद के लिए गुहार लगाने लगी कि गोरखे फौजी भैया मुझे बचा लो। मैं आपकी बहन हूँ। बिष्णु के दिमाग में उसके शब्द कौंधे। ये ख्याल आया कि मेरी बहन होती तो क्या यूं ही चुपचाप देखता। तुरंत खुखरी थाम ली। एक करीब खड़े डाकू को पकड़ के उसके गले में खुखरी रख के उसको सामने कर दिया। उससे बोले कि देख, मैं गोरखा फौजी हूँ। मारना और मरना खूब अच्छे से जानता हूँ। मेरी जान चली भी जाए तो मेरे परिवार को सरकार पेंशन देगी। तू मेरे हाथों मारा जाएगा तो तेरे परिवार को कोई देखेगा भी नहीं। वह डाकू सहमा हुआ था। चुपचाप बिष्णु की बात मान के उनके इशारे पर आगे चलता रहा। बिष्णु उसी की आड़ में आगे बढ़ा और बेखौफ-बदले हालात से बेखबर आबरू लूटने में व्यस्त डाकुओं पर टूट पड़ा। उनकी खुखरी बिजली की तेजी से डाकुओं पर चल पड़ी। एक के बाद एक डाकू इस भीषण-आकस्मिक खुखरी हमले से मांस के लोथड़ों में कट के गिरने लगे। 3-4 डाकू उसी वक्त परलोक सिधार गए।

इस दौरान बिष्णु ज़ोर-ज़ोर से सिंहनाद भी करते जा रहे थे। इससे अन्य डाकुओं में भी बहुत आतंक छा गया। वे फिर भी बिष्णु पर हमला करने की कोशिश करते रहे। बिष्णु ने भी सोच लिया था कि अब या तो मरना ही है या फिर डाकुओं को मारना होगा। इसी के साथ वह बचे डाकुओं पर भी खुखरी ले के टूट पड़े। उनके रौद्र रूप तथा अपने साथियों की कटी-फटी लाशें और रक्तपात देख डाकुओं में तब तक बुरी तरह खौफ पसर चुका था। खास बात ये रही कि ऐसे हालात में भी बिष्णु की मदद के लिए कोई भी शख्स हिम्मत जुटा के मदद के लिए खड़ा नहीं हुआ। बिष्णु अकेले ही डाकुओं से लड़ते रहे। आखिर भयभीत हो उठे डाकुओं ने हार मान ली और ट्रेन से कूद के भाग खड़े हुए। उनके जाते ही सभी यात्री कूद के डिब्बे से निकल गए। ट्रेन के डिब्बे में सिर्फ बिष्णु और वह बंगाली परिवार रह गया था। बिष्णु ने उस युवती को चादर दे के उसके तन को ढँक दिया था। इसी बीच खाली ट्रेन में 2 बदमाश चुपचाप यात्री की तरह हथियार छिपा के फिर आए।

बिष्णु को लगा कि वे यात्री ही हैं। अचानक करीब आ के उन्होंने कुल्हाड़ी से लड़की पर हमला बोल दिया। बिष्णु ने लड़की को बचाने के लिए फुर्ती के साथ कुल्हाड़ी को थामने की कोशिश की। लड़की तो बच गई लेकिन कुल्हाड़ी उनकी कलाई पर जा घुसी। उनका हाथ बुरी तरह जख्मी हो गया। इसके बाद दोनों डाकू भाग खड़े हुए। वह लड़की MBBS की पढ़ाई कर रही थी। उसने ही बाद में बिष्णु के हाथ की काम चलाऊ Dressing की। ट्रेन जब चितरंजन पहुंची तब उस युवती ने वहाँ उतर के अफसरों-पत्रकारों को पूरी घटना और बिष्णु की बहादुरी-साहस का वर्णन किया। बिष्णु को लेने और उनकी सुरक्षा के लिए तत्काल फौज के 2 अफसर-7 JCOs और 70 जवान आ गए। उनका VRS रद्द कर उनको फिर Battalion में लिया गया। उनको Gallantry Award से सम्मानित किया गया। उनकी बहादुरी और एक अनजान बहन-बेटी के लिए जिंदगी को दांव पर लगाने से न हिचकने वाले बिष्णु पर फिल्म बनाने के लिए उनकी कहानी के अधिकार खरीदने फिल्म निर्देशक महेश भट्ट और हिमेश रेशमिया उनसे मिलने आए।

उन पर `Kill’ फिल्म बन चुकी है। बायोपिक भी बन रही। नेपाल में भी फिल्म निर्माता-निर्देशक उनसे मिल रहे। उनसे ही फिल्म में नायक की भूमिका करने की पेशकश कर रहे हैं। एक बेटा और एक बेटी के पिता बिष्णु ने आखिरकार साल-2018 में दुबारा फिर कोशिश कर Pre Mature Retirement लेने में सफलता पाई। वह 7/8 Gorkha Regiment में थे। देहरादून में जोहड़ी गाँव के करीब सिनौला में उनकी बहन रहती हैं। वह बहन के परिवार में शादी समारोह में पत्नी के साथ आए हुए हैं। भारत सरकार ने उनकी जांबाजी का सम्मान करते हुए सेना मेडल और उत्तम जीवन रक्षक पदक से नवाजने के साथ ही उनकी रेल यात्रा और विमान सेवा आजीवन Free की है। उनके साथ कोई एक अन्य मुफ्त यात्रा कर सकता है। नेपाल सरकार ने भी उनको नकद पुरस्कार देने का ऐलान किया था। जो आज तक मिला नहीं है।

उनसे फोन पर संपर्क हुआ और फिर वह मेरे निमंत्रण पर घर आए। ये बताते हुए वह नहीं हिचके कि 3-4 लोगों ने उनसे मेरे बारे में जिक्र किया था। वह भी मुझसे मिलना चाहते थे। बेशक बिष्णु से मिलने की मेरी चाहत ज्यादा थी। उन्होंने खुद ट्रेन में बहादुरी का किस्सा सुनाया तो एक बार भी ऐसा नहीं लगा कि वह अपनी जांबाजी को कुछ अधिक विस्तार से बताना चाहते हैं। एकदम सामान्य भाव में बताया। तब मुझे एक बारगी हवलदार राज बहादुर गुरुंग (दिवंगत) की याद भी आई। 1971 की भारत-पाकिस्तान जंग में उन बामुश्किल 5 फीट कद के वीर राज बहादुर गुरुंग ने 25 पाकिस्तानी सैनिकों को उनके खंदक में कूद के खुखरी से काट डाला था। इस दौरान 21 गोलियां लग के बाद वह मूर्छित हो गए थे। उनको वीर चक्र से नवाजा गया था। Retire होने के बाद देहरादून में वह चंद्रबनी में परिवार के साथ रहते थे।

मैं उनसे साल-1996 में अपने नियमित Column `फौजी की डायरी’ लिखने के दौरान मिला था। उन्होंने भी अपनी वीर गाथा को बेहद सामान्य अंदाज में ऐसे बताया था मानो सब्जी खरीद के लाने सरीखा किस्सा हो। वह भी मूल रूप से नेपाल के वाशिंदे थे। बिष्णु ने शायद VC गजे घले और राज बहादुर गुरुंग की वीरता-साहस-जांबाजी की परंपरा को और रोशन किया। एक अनजान बहन के लिए अपनी जिंदगी को दांव पर लगाने के धर्म और कर्तव्य को उन्होंने सबसे ऊपर रखा। बिष्णु श्रेष्ठ को सलाम….भारतीय सेना को भी उन पर गर्व है..

 

 

 

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