दास्तान-ऐ-उत्तराखंड सियासत!अलीबाबा का सिरदर्द 40 चोर नहीं बल्कि घर के अपने!मंत्रिमंडल विस्तार के शोर में PSD का ध्यान खींचने की विधायकों की कोशिश!
The Corner View

Chetan Gurung
उत्तराखंड सियासत की हकीकत-पहचान आपसी मारकाट में फंसे रहना और दुश्मन के बजाए घर के लोगों पर खंजर ले के टूट पड़ने की रही है। इस राजनीतिक कैंसर का ईलाज अब तक 25 साल की सरकार का हिस्सा रही BJP और Congress आज तक नहीं तलाश पाई। अलीबाबा को यहाँ 40 चोरों से नहीं बल्कि घर के लोगों से जूझना पड़ता रहा है। जब Congress सरकार रही तो उसके सूबेदार-जागीरदार अपनी टुकड़ियों के साथ अपने ही सरदार पर हमलावर रहे। BJP की सल्तनत रही तो उसके नंबरदार से ले के जमींदार-कथित सिपहसालार अपने लश्कर के साथ अपने ही सुल्तान पर धावा बोलने से कभी नहीं चूके। BJP और Congress में यही आलम है और रहा है। राजनीतिक वायुमंडल में तैरते मौजूदा नजारों पर नजर डालें तो Congress में अंदरखाने और सत्तारूढ़ दल के छोटे-बड़े चेहरों में आमने-सामने की अपनी पार्टी को ही नुक्सान करने वाली जंग देखने को मिल रही। इसको इसमें उलझे लोगों की अपरिपक्वता करार दिया जा रहा।
ये सब कोई नया नहीं है। राज्य गठन के साथ ही सल्तनत का सुल्तान बनने की महत्वाकांक्षा और इसके चलते एक-दूसरे की पीठ पर छुरा घोंपने और खुली चुनौती देने से बाज न आने की प्रवृत्ति ने भी जड़ें जमा ली। नित्यानन्द स्वामी पहली अन्तरिम BJP सरकार के CM बने लेकिन एक साल भी कुर्सी पर नहीं रह सके। उनके कदमों के नीचे से कालीन खींच के उनको धड़ाम कर डाला। इसके लिए भले मुझको भी जिम्मेदार ठहराया जाता है कि मैंने उनका बेहद विवादास्पद-धमाकेदार Interview न किया होता तो उनका बाल भी बांका नहीं होता। मेरी सोच ये है कि वह interview सिर्फ एक सहारा स्वामी विरोधियों के लिए अभियान को मजबूती देने का रहा होगा। इकलौता कारण नहीं। मैं तब एक बड़े Daily अखबार में था।
Chetan Gurung
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स्वामी के मुख्यमंत्री बनाए जाने से बड़े चेहरे नाखुश थे। इनमें डॉ रमेश पोखरियाल निशंक,केदार सिंह फोनिया, भगत सिंह कोश्यारी और कुछ अन्य प्रमुख थे। साल-2002 में पहले आम चुनाव में Congress ने Assembly Elections को BJP की इसी आपसी सिर्फ फुटव्वल के चलते अप्रत्याशित तौर पर जीता और उत्तराखंड राज्य का तोहफा देने वाली पार्टी को पहले ही चुनाव में तगड़ा झटका दे डाला। हर संभावनाओं को खारिज कर High Command ने नारायणदत्त तिवारी को CM की शपथ लेने भेजा। प्रदेश Congress President हरीश रावत मायूस कर दिए गए। शपथ ग्रहण समारोह में ही मालूम चल गया था कि सरकार में आगे क्या होने वाला है। ONGC के Auditorium में शपथ ग्रहण समारोह में हरीश खेमे के राजीव जैन मेरे साथ ही बैठे थे। वह NDT के सामने ही उनको खूब खरी-खोटी सुनाने से बाज नहीं आ रहे थे। तिवारी को फिर 5 साल तक हरीश खेमे ने सुखचैन से नहीं रहने दिया। इस मुहिम में प्रीतम सिंह,रणजीत रावत,मदन बिष्ट,प्रदीप टमटा आगे रहते थे।
साल-2007 में BJP सरकार की वापसी हुई। BC खंडूड़ी CM बने। एक बार फिर BJP के महत्वाकांक्षी पुराने सिपहसालारों ने उनका जीना मुहाल कर दिया। कल्याण सिंह की सदारत में होटल पैसिफिक में जब कोश्यारी के बजाए पूर्व मेजर जनरल को सरकार की कमान सौंपने का ऐलान हुआ तो होटल में ही पार्टी वालों में जम के जूतमपैजार हुई। BCK को न नाराज खेमे और न ही Media को मनाना आया। फिर भी उनको सत्ताच्युत करना उनके विरोधियों के लिए आसान नहीं हो रहा था। साल-2009 आया। लोकसभा चुनाव में BJP उत्तराखंड की सभी 5 Seats हार गई। मुझे याद है। चुनाव के दौरान एक रात मुझे मुख्यमंत्री आवास (तब सर्किट हाउस एनेक्सी) में बुलाया गया। उनके सचिव प्रभात सारंगी और Director Information विनोद शर्मा साथ थे। BCK ने पूछा कि आपकी रिपोर्ट क्या है? कितनी सीटें BJP को मिलेंगी। उन्होंने सभी सीटें जीतने का दावा किया। मैंने सभी हारने का। सारंगी सुनते रहे लेकिन BCK ने पहले 5-0,फिर 4-1 फिर 3-2 का दावा किया। नतीजा आया तो 0-5 रहा। उनके खिलाफ बगावत हो गई। वह कुर्सी से बाहर हो गए।
उनकी जगह CM बने निशंक। वह भी साल-2012 का Assembly Elections बतौर मुख्यमंत्री नहीं देख पाए। 6 महीने पहले उस वक्त अचानक हटा दिए गए। BCK की वापसी हुई। खंडूड़ी है जरूरी के नारे के साथ। निशंक को हटाने और BCK के फिर मुख्यमंत्री बनाने की दिल्ली में चल रही Meeting की खबर मुझे दिल्ली के एक साथी News Channel के Editor ने दिया। न निशंक को न ही BJP के प्रदेश अध्यक्ष बिशन सिंह चुफाल को इसकी भनक थी। होगी भी तो मैंने उनसे जब दिल्ली से खबर आते ही फोन पर पूछा तो उन्होंने इसको बेसिरपैर का करार दिया था। अगले दिन निशंक हट गए थे। BCK को फिर उन लोगों ने कोटद्वार की जंग में खेत डाला, जो उनके विरोधी थे। सिर्फ एक सीट से BJP ने विधानसभा चुनाव गंवाया। ये बात दीगर है कि आज के मोदी-शाह का दौर होता तो सरकार आराम से BJP की बन गई होती।
Congress की सरकार तो बनी लेकिन एक बार फिर हरीश रावत को मायूस कर आला कमान ने पैराशूट CM विजय बहुगुणा भेज दिया। VB को हरीश लॉबी ने जम के परेशान किया। उनको 2 साल से कुछ अधिक अरसे में ही हटना पड़ा। आखिर हरीश उनकी जगह मुख्यमंत्री बने। उनको फिर उनके ही विरोधियों ने रेल डाला। सरकार गिरवा दी। वह बामुश्किल Supreme Court के आदेश से सरकार बहाल करवाने में सफल रहे। साल-2017 में Congress तमाम आरोपों से लद-कलंकित हो के सरकार से विदा हुई। BJP की त्रिवेन्द्र सिंह रावत की अगुवाई में सरकार बनी। उनको पार्टी में अंदर ही अंदर सुलग रही बगावत की गंभीरता की भनक नहीं लगी। 4 साल पूरे होने से 3 दिन पहले वह हटा दिए गए।
4 महीने से कम वक्त में उनकी जगह Covid काल में मुख्यमंत्री बने तीरथ सिंह रावत कोरोना काल में ही हटा दिया गया। बैठ-लेट चुकी BJP को फिर से सरकार में लाने कि ज़िम्मेदारी तब पुष्कर सिंह धामी को अप्रत्याशित रूप से सौंप दी गई। PSD ने कमाल करते हुए इतिहास रचा और फिर से BJP की सरकार बना डाली। पुष्कर को कम उम्र और प्रशासनिक अनुभवहीनता के बावजूद BJP का अब तक का सबसे सफल और चतुर मुख्यमंत्री कहा जा सकता है। उनको NDT-हरीश रावत-निशंक की खूबियों का सफल मिश्रण कहा जा सकता है। NDT ने BJP को मित्र विपक्ष बना डाला था। उनके इस गुण को अपना के पुष्कर ने आज की Congress के कई बड़े चेहरों को एक किस्म से अहम मसलों और मौकों पर शांत करने में सफलता पाई है। उनको राज्य में राजनैतिक अस्थिरता खत्म करने और स्थिरता लाने के लिए भी जाना जा रहा।
उनके लिए दिक्कत सिर्फ उन BJP नेताओं से आ रही हैं जो सियासी परिपक्वता दिखाने में सफल नहीं हो रहे। जिनकी हरकतें-बयान संगठन-सरकार के माफिक नहीं हैं। 2 BJP MLA, जो मंत्री रहे और काफी वरिष्ठ हैं, इन दिनों सुर्खियों में हैं। उससे पहले भी इसी पार्टी के कुछ और बड़े चेहरों ने अपने व्यक्तव्यों से सुर्खियां बटोरी और नेतृत्व को असहज किया। BJP नेतृत्व का ऐसे हालात से नाखुश होना स्वाभाविक है। PSD की मेहनत को वे धक्का दे रहे। इसके बावजूद एक सीमा से बाहर जाने का दुस्साहस शायद आक्रामक तेवर दिखाने के बावजूद बयानों से सनसनी फैलाने वाले पार्टी विधायक नहीं कर पाएंगे। इसकी वजह है। वे जानते हैं कि इससे उनको नफा हो या न हो लेकिन नुक्सान जरूर हो सकता है।
मौजूदा CM पुष्कर सिंह धामी में राजनीतिक चातुर्य-धैर्य की कमी नहीं है। अमल-ऐ-मैदान में उनको कैसे और क्या करना है, बाखूबी जानते हैं। उन पर केंद्र सरकार और BJP के असली आका PM नरेंद्र मोदी तथा HM अमित शाह का भरपूर संरक्षण-आशीर्वाद है। दोनों God Father की हर सोच और Mission के साथ ही संघ के Agenda को वह फरमान आने से पहले अंजाम दे डालते रहे हैं। हर छोटे-बड़े Elections को वह पार्टी की झोली में दाल के अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को लगातार दौड़ा रहे। मोदी-शाह को अपनी तरफ से लगातार फतह का तोहफा पेश किए जा रहे। ऐसे मुख्यमंत्री को वह नाराज या नाखुश करने का जोखिम नहीं ले सकते हैं। उनकी एक रिपोर्ट सियासी जिंदगी को बुरी तरह प्रभावित कर सकती है।
सुगबुगाहट है कि CM पुष्कर को जल्द ही अपने हिसाब से मंत्रिमंडल विस्तार और कुछ फेरबदल करने की आजादी मिलने वाली है। कयासबाजी रह-रह के पहले भी इसी सिलसिले में खूब गरम होती रही है। इस बार लेकिन संभावना बलवती लग रही। विस्तार तो तय है लेकिन मंत्री बदले जाएंगे या नहीं और बदले जाते हैं तो किस पर गाज गिरेगी, चर्चा इस पर अधिक हो रही। पुष्कर के विश्वासपात्र और छवि-प्रतिष्ठा के मामले में समृद्ध मंत्री ही बच सकेंगे। ऐसा लगता है। तस्वीर शायद जल्दी साफ होगी। नए मंत्रियों को कम से कम 17-18 महीने का मौका अपनी प्रतिभा और काबिलियत दिखाने का दिया जा सकता है। ये भी संभव है कि अभी फेरबदल होता है तो कुछ महीने बाद मंत्रिमंडल में बचा-खुचा फेरबदल में हो। उसमें पार्टी और PSD की रिपोर्ट ही माने रखेगी।
आज की BJP में जातीय और क्षेत्रीय समीकरण देखें तो जाते हैं लेकिन ये अनिवार्य नहीं। विधायकों को ये मालूम है। एक जिले से 2 मंत्री और एक ही जाति के अधिक मंत्री बन जाएँ तो ताज्जुब नहीं। मंत्री बनने के मानक सिर्फ पार्टी और CM निष्ठा है। BJP में कुछ विधायकों की अति सक्रियता और दौड़-धूप के साथ ही बयानों के बाण भी इसी संदर्भ में देखे जा रहे। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि वे ऐसा कर के मुख्यमंत्री का ध्यान मंत्रिमंडल में शामिल होने के अपने दावे की तरफ आकृष्ट करने की कोशिश कर रहे। वे कोशिश कर रहे कि PSD पर दबाव बनाया जाए और खामोशी बरतने के बदले मंत्री की कुर्सी उनको दी जाए। वैसे ये सब अंदाजे हैं। अकाट्य नहीं।