पुष्कर विरोध यानि मोदी-शाह के खिलाफ जाना!अस्थिरता के खिलाड़ियों को झटका मुमकिन!
The Corner View

Chetan Gurung
बतौर मुख्यमंत्री कामयाब होना या फिर इस कुर्सी पर लंबे समय तक बने रहना कम से कम BJP की सरकार रहते बहुत बढ़ी और कठिन चुनौती रही है। Congress में भी अगर ND तिवारी के दौर को छोड़ दें तो न हरीश रावत और न ही विजय बहुगुणा कामयाब रहे। VB को 5 सा होने से पहले तख्त से उतार डाला गया था। हरीश कभी सुकून से काम नहीं कर पाए। लंबे समय तक राज करने के चलते BJP के हिस्से इस किस्म की नाकामयाबी अधिक आईं। पहले अन्तरिम सरकार में नित्यानन्द स्वामी को साल-2002 के पहले विधानसभा के आम चुनाव का का इंतजार किए बिना हटा दिया गया। उनकी जगह हाल ही में पद्म भूषण से अलंकृत किए जाने के लिए चुने गए भगत सिंह कोश्यारी कुछ महीने के लिए उनकी जगह मुख्यमंत्री बनें।


PM नरेंद्र मोदी (ऊपर) और HM अमित शाह (नीचे) के करीबी-Blue Eyed Man CM पुष्कर सिंह धामी को चुनौती देना घर के विरोधियों के लिए सीधे Number-1 और Number-2 के खिलाफ ताल ठोंकना होगा
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साल-2007 में BJP की सरकार में वापिस हुई। पूर्व सैन्याधिकारी BC खंडूड़ी भारी आंतरिक विरोध के बावजूद CM बनें। बीच में ही हटा दिए गए। रमेश पोखरियाल निशंक उनके उत्तराधिकारी बने। साल-2012 के विधानसभा चुनाव से 6 महीने पहले भनक दिए बिना उनको भी कुर्सी से फारिग कर दिया गया। फिर से BCK ने कुर्सी संभाली। Congress ने साल-2012 में वापसी की। तब बहुगुणा-रावत वाला Episode हुआ। Congress घरेलू कलह से इस कदर डूब गई कि साल-2017 में उसकी जो छुट्टी विधानसभा चुनाव में हुई तो फिर आज तक वापिस सत्ता में लौटने के ख्वाब देख रही।
इस बीच उसकी उम्मीदें BJP के सूबेदार-तहसीलदार-जमीदार किस्म के लोग जरूर जगाते रहे। जो अपनी ही सरकार को हिलाते और मुख्यमंत्री को खुल के तथा बेधड़क काम करने देने से दूर-दूर तक वास्ता रखते नहीं दिखते। त्रिवेन्द्र सिंह रावत इसकी मिसाल बने। BJP के ही कुछ क्षत्रप उनके खिलाफ लगातार साजिशें रचने और उनको सत्ताच्युत करने में जुटे रहे। आखिर 4 साल का कार्यकाल पूरा होने से कुछ दिन पहले वे अपनी चाल में कामयाब हो गए। BJP आला कमान और खास तौर पर PM नरेंद्र मोदी और HM अमित शाह की यहाँ तारीफ की जा सकती है। दोनों ने खुरपेंचियों को फिर हताश कर दिया और उस तीरथ सिंह रावत को CM बना डाला, जिनका नाम किसी के दिमाग में नहीं था।
नाम तब धन सिंह रावत-सतपाल महाराज और कुछ-कुछ अनिल बलूनी का लिया जा रहा था। मोदी-शाह को लगा कि तीरथ के साथ BJP की नौका आगे नहीं बढ़ पाएगी। चुनावी समंदर सामने होगा तो उसको पार करने के बजाए नौका भंवर में फंस के डूब जाएगी। पूरी BJP का सफाया हो सकता है। ये आशंका उन दिनों जबर्दस्त थी। खुद BJP के लोग इसको हवा दे रहे थे। Congress के नेताओं ने खुद को सरकार मान लिया था। तमाम नौकरशाह उनके दरबार में चुनाव से पहले ही कोर्निश बजाने लगे थे। तब मोदी-शाह ने एक और तुरुप चाल चली। 2 बार के MLA और बेहद युवा खटीमा के पुष्कर सिंह धामी, जिनको सरकार चलाने का `क’ तक नहीं मालूम था, के कंधों पर चुनावी समर फतह करने का वह लक्ष्य सौंपा, जिसको तब तक कोई विजित नहीं कर पाया था।
एक बार फिर वे चेहरे बुरी तरह मायूस और लटक गए, जिनको खुद के राज्याभिषेक की पूरी उम्मीद थी। पुष्कर दरअसल उनके लिए Out of Syllabus सवाल की तरह आ गए थे। फिर अनुभवहीन और युवा पुष्कर ने एक हारी हुई जंग समझी जाने के बावजूद चुनाव में जो किया वह इतिहास बना। ये पुष्कर के कट्टर विरोधी भी मानते हैं कि वह चुनाव सिर्फ मोदी और शाह के नाम से नहीं जीता गया था। पुष्कर की रात-दिन की दौड़-धूप,मेहनत और कार्यकर्ताओं में जुनून-जोश भर के फिर से पार्टी को खड़ा करने के जलवे ने हारी हुई बाजी Congress के मुख से छीन ली थी। साल था,2022 का।
PSD के पीछे अपनी ही पार्टी में त्रिवेन्द्र के पीछे नासूर बन के चिपके लोग फिर इस सोच के साथ लग गए कि मुख्यमंत्री को न जीतने दिया जाए। वे समझ चुके थे कि BJP एक हार चुकी बाजी फिर से जीतने के कगार पर है। सरकार आने के बाद फिर पुष्कर को CM बनने से रोक नहीं सकते। PM मोदी और HM शाह ने देवभूमि में ही खुल के बोल दिया था कि अगले मुख्यमंत्री पुष्कर ही होंगे। चुनाव के नतीजे आए तो गढ़ आला सिंह गेला हुआ। पुष्कर उम्मीदों के मुताबिक निजी जंग खटीमा में गंवा बैठे लेकिन सरकार बचाने का इतिहास रच डाला। फिर लोकसभा चुनाव में 5 की 5 सीटें एक बार फिर जितवा डालीं। अनुभवहीनता के बावजूद पुष्कर को उत्तराखंड के अब तक के सफलतम मुख्यमंत्रियों की छोटी सी List जिसमें NDT इकलौते विराजमान समझे जाते थे, में शरीक समझा जाता है।
पुष्कर मोदी-शाह की हर उम्मीद पर खरे उतर रहे। संघ के एजेंडे को भी अंजाम दे रहे। आला कमान का Blue Eyed Man बनना इतना आसान नहीं होता। पुष्कर पर मोदी-शाह का भरोसा कभी नहीं टूटा। यहाँ तक कि खटीमा हारने के बावजूद। दोनों ने फिर PSD को अपने वादे के मुताबिक सरकार की कमान सौंप दी। दिल्ली के BJP सूत्रों और वहाँ की पत्रकारिता में मजबूत दखल रखने वाले पत्रकारों की माने तो पुष्कर को फिर से साल-2027 के विधानसभा चुनाव में कमल पताका फहराने का जिम्मा सौंपा जा चुका है। नए पार्टी अध्यक्ष नितिन नबीन भी मोदी-शाह की राय के साथ हैं। दावा है कि PSD को खुद भी साफ-साफ इशारा दिया जा चुका है।
मोदी-शाह के बाद नितिन नबीन भी नए अध्यक्ष होने के बावजूद उत्तराखंड की सियासत से अनजान नहीं होंगे। तीनों ये भी जानते ही होंगे कि मुख्यमंत्री को किस तरह अपने ही लोग और खास तौर पर बड़े नंबरदार परेशान करने की कोशिश कर रहे। कौन सरकार में अस्थिरता फैलाने और इसका संदेश लोगों में देने की चेष्टा कर रहे हैं। सर्वोच्च त्रिमूर्ति बस हालात को देख के फिलहाल शांत हो सकती है। चुनाव के लिए जब 1 साल का वक्त रह गया हो तो जल्दबाज़ी में कोई कदम उठाने के बजाए इंतजार कर सही वक्त पर गरम लोहे पर हथौड़ा मारा जाना ठीक रहेगा। ये वक्त आएगा जरूर। मोदी-शाह इस बात को हरगिज बर्दाश्त करने वाले की प्रतिष्ठा नहीं रखते कि कोई भी शख्स उनकी इच्छा और पसंद के विरोध में खड़े होने का दुस्साहस दिखाए।
उत्तराखंड में शायद BJP के एक धड़े को याद नहीं रह गया कि पुष्कर को 2 बार CM की कुर्सी बिना किसी Lobbing के सौंपने का फैसला मोदी-शाह का है। पुष्कर के खिलाफ Lobbing करने का मतलब सीधे उन दो महा शक्तिशाली कद्दावरों का खुला विरोध है, जिन्होंने CM बनाने का फैसला लिया। इसकी कीमत उनको भविष्य में चुकानी पड़ सकती है। समीक्षकों का मानना है कि सीमित संसाधनों और बेहतरीन किस्म के कुशल नौकरशाहों (IAS-IPS) के सर्वथा अभाव और पार्टी के ही कुछ अति महत्वाकांक्षियों की चालों, अधिकांश मंत्रियों के महज सिर दर्द साबित होने और तमाम गंभीर भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे होने के बावजूद पुष्कर ने कई बड़े और ठोस फैसले लेने के साथ ही उनको अमल में लाने में भी कोई हिचक नहीं दिखाई। अन्य BJP शासित राज्यों के CMs ऐसी कुशलता दिखाने में अभी सफल नहीं हो पाए हैं।
UCC-धर्मांतरण-भूमि कानून लागू करना बहुत बड़ा कदम है। नकल विरोधी कानून-सरकारी भर्तियों का फाटक खोल देना और एक से बड़े एक विवादों (अंकिता भण्डारी हत्या-सुखवन्त अत्महत्या और Paper Leak) को Smart फैसलों से सुलटा देना PSD की बतौर CM बड़ी कामयाबी के साथ ही उनकी सियासी परिपक्वता को जतलाती है। दूसरी तरफ उनके विरोधियों ने न सिर्फ राजनीतिक अपरिपक्वता दिखाई बल्कि मोदी-शाह को भी जाने-अनजाने चुनौती दे दी या दे रहे हैं। कुछ MPs और MLAs के अपने ही मुख्यमंत्री के प्रति कटाक्ष भरे बयान आए दिन संसद और सार्वजनिक मंचों पर सुने और देखे जाते हैं।
कुछ समीक्षक ये भी मानते हैं कि ऐसा शायद वे हताशा में कर रहे हैं। उनको लग रहा है कि उनकी तमाम कोशिशों और चालों का असर नहीं हो रहा। चुनाव तक पुष्कर फिर मुख्यमंत्री रहे और फिर सत्ता बदलाव नहीं हुआ तो उनके लिए आने वाले साल भी रीते हाथ वाले रहेंगे। इसलिए वे बेचैन दिखते हैं। Lobby बना चुके हैं। दिखावे के तौर पर PSD के साथ खड़े रहते हैं। मोदी-शाह की क्षमता और उनको लगता है वे ढंग से पहचान या भाँप नहीं पाए हैं। दोनों महाशक्तिशाली के पास उत्तराखंड की एक-एक छोटी-बड़ी रिपोर्ट का रहना स्वाभाविक है। उनको अगर पुष्कर में कोई कमी दिखती या फिर उनके बजाए कोई और श्रेष्ठ CM विकल्प दिखता तो वे नया CM चेहरा लाने में एक पल न लगाते।
सियासी अस्थिरता का राग Congress के बजाए BJP वाले ही अधिक अलापते नजर आते हैं। खास बात ये है कि इन दिनों BJP के विधायकों की मुख्यमंत्री पुष्कर से मिलने का सिलसिला बहुत अधिक और तेज हो गया है। आज ही रानीखेत के प्रमोद नैनवाल-विकासनगर के सहदेव पुंडीर और कर्णप्रयाग के अनिल नौटियाल मुख्यमंत्री से मिले। इस किस्म का मिलना-मिलाना रोजाना हो रहा। ये वे हैं, जिनको पूरा अहसास है कि चुनावी रथ की रास फिर से पुष्कर के हाथों होनी है। उनका भरोसा जीत के बचे सवा साल के लिए मंत्री बना जा सकता है। बतौर मुख्यमंत्री पुष्कर को ये शिकायत जरूर सुनने को मिलती है कि नौकरशाह (IAS-IPS) जो जिलों या शासन में अहम ओहदे संभाल रहे हैं, उनको तवज्जो नहीं देते हैं। इससे अवाम के कामकाज पर असर पड़ सकता है। इसमें हकीकत मुझे भी दिखती है। अहम महकमे संभाल रहे सचिव या और ऊपर बैठे नौकरशाह, कुछ कप्तान मुख्यमंत्री से काम करने की छूट का बेजा इस्तेमाल करते नजर आते हैं।
मजबूत पकड़ रखने वाले HoDs अपने ही सचिव की बातों पर कान नहीं देते हैं। एक ढंग की कसरत इस दिशा में करते हुए System को अवाम और अपनी पार्टी के लोगों के सामने नए रूप रंगे में चुस्त और उम्मीद जगाने वाले अंदाज में लाया जाता है तो CM पुष्कर को अपने चुनावी समर अभियान में निस्संदेह अधिक फायदा होगा। नौकरशाहों से सरकार की छवि-प्रतिष्ठा बनती और सँवरती है। कुछ के बारे में कहा जा सकता है कि वे खुद को ही सरकार मान बैठे हैं। इनको कसना जरूरी है। कानून-व्यवस्था पर कोई भी ढिलाई नहीं सही जा सकती है। निष्कर्ष ये कि पार्टी के आंतरिक विरोधियों को अपनी इच्छा पूर्ति के लिए पहले पुष्कर का ठोस विकल्प तलाशना होगा। ये मुमकिन नहीं लग रहा। ऐसा कोई चेहरा जो सरकार चलाने में उस्ताद हो,संगठन का भी विश्वास जीते और हर कठिनतम चुनौती से पुष्कर की तरह सरकार-BJP का बेड़ा पार लगाए, BJP के भीतर फिलहाल कहीं दिखता नहीं। ऐसी सूरत में दूरगामी हालातों में विरोधी झटका खा जाएँ तो ताज्जुब नहीं होगा।



